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एक डर ऐसा भी

Ramesh Babu 22 Feb 2025 आलेख समाजिक आत्मज्ञान 24009 0 Hindi :: हिंदी

मनुष्य अपने जीवन में हर किसी व्यक्ति पर विश्वास नहीं करता है। उसके मन में हमेशा यही चलता रहता है। कि किस पर या कैसे विश्वास किया जाऐ। यहां तक की गुल - मिलकर रहने वाले व्यक्ति पर भी नहीं। उसे हमेशा इस बात का डर सताता रहता है। कि न जाने यह कब या कौन सी जगह कुछ अनुचित कार्य ने कर दे जिससे कि बाद में स्वयं को पछताना पड़े। लेकिन यह भी अटल सत्य  हैं। कि - जो व्यक्ति आंखे मूंद कर किसी दूसरे पर विश्वास करता है। मतलब स्वयं को भी अपने जैसा दूसरे को समझता है। लेकिन इसका तात्पर्य यह भी साबित नहीं होता है। कि- क्या बह
उसकी बात पर खरा उतरेगा। यह तो आने वाली समय ही तय करता है। लेकिन जो उसे कार्य पर खरा उतरता है। बह उसे स्थान को पा लेता है। जहां हर कोई व्यक्ति नहीं पहुंच पाता है। लेकिन ज्यादातर व्यक्ति स्वार्थिहीन होते जो यह समय देखने रहते हैं। कि- कब उन पर विश्वास किया जाए। जिससे कि वह अपने स्वयं के स्वार्थहीन कार्य को अंजाम दे सके। लेकिन बह यह नहीं सोचते कि जिसने तुम पर विश्वास किया है। बह तुम पर विश्वास कर रहा है। या तुम्हारी परीक्षा ले रहा है। कि तुम किसी लायक या कैसे हो। स्वार्थ व्यक्ति को लोभी बनता है। जबकि परस्वार्थ व्यक्ति को परोपकारी बनने का रास्ता दिखाता है। लेकिन हर कोई व्यक्ति उसे रास्ते पर नहीं चल सकता। क्योंकि उसे पर चलने के लिए। व्यक्ति को स्वयं का समय देना एवं लाभ से वंचित रहना पड़ता है। लेकिन यह सोच सभी व्यक्तियों मैं नहीं पाई जाती है।
स्वार्थ है तो परस्वार्थ भी रहता है। और यह जीवन भर चलता ही रहेगा।

   लेखक -  रमेशबाबू लोधा

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