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कहानी- देख सत्य ,नजरिया असत्य

Ramesh Babu 21 Feb 2025 कहानियाँ समाजिक सोच 43273 0 Hindi :: हिंदी

शशिपुर गांव में भोलाराम नाम का एक पंडित अकेला रहता था। जो की नाम से ही नहीं काम से भी बोला था।
गांव में कोई दूसरा पुजारी पूजा करता था। इसलिए अपने भरण पोषण के लिए बह पास ही के गांव में पूजा करने जाता था। किंतु दूसरे गांव दूर होने के कारण आने-जाने में बहुत समय लगता था। फिर उसने सुना कि किसी गांव में पंडित जी की जरूरत है। तथा रहने के लिए मकान भी दिया जाएगा। फिर उसने सोचा कि ऐसे भी अपने आगे पीछे कोई नहीं है। तथा इस घास-फूस की झोपड़ी से तो अच्छा ही मकान मिलेगा। साथ ही आने-जाने की बीमारी भी खत्म हो जाएगी। फिर पंडित जी अपने झोंले बिस्तर बांध चल दिए। दूसरे गांव में पहुंचने पर सरपंच, पटेल, गांव वालों से बात करने पर मंदिर की पूजा करने के लिए हा भर दी गई। साथ सभी गांव वालों से पूजा करने के बाद भिक्षा भी ली जाए। और रहने का प्रबंध भी गांव के पास किया गया। लेकिन प्रिय पाठको मैं बताना चाहता हूं। कि जहां पंडित जी को रहने के लिए मकान दिया गया। उसके आगे वेश्यावृत्ति करने वाली महिलाओं के मकान तथा उसके आगे राशन की दुकान थी। तथा मकान लंबी कतार में जगह - जगह बसे हुए थे। पंडित जी के मकान से अंतिम छोर में मंदिर था। यानी अगर मंदिर से पंडित जी के मकान की तरफ जाए तो अंतिम छोर में पंडित जी का मकान था। इसलिए पंडित जी पूजा करने के लिए सर्वप्रथम मंदिर में जाकर उधर से भिक्षा मांग कर राशन की दुकान से खाने पीने का सामान लेकर। वेश्याओं से भिक्षा मांग कर अपने मकान में पहुंचते थे। ताकि बचे हुए अनाज को खाने के रूप में प्रयोग कर सके। दो-चार दिन तो यह लगातार क्रिया जारी रही पंडित जी। पूजा करना भिक्षा मांगना और दुकान से राशन लेकर वेश्याओं के घर से अनाज लेकर अपने मकान पर जाना। धीरे-धीरे यह बात गांव में आग की तरह फैल गई। की पंडित जी भिक्षा लेकर भिक्षा में आए हुए अनाज दुकान पर बेचकर। पैसे लेकर वेश्याओं के घर जाता है। जबकि इस बात का पता पंडित जी को भी नहीं था। कि घर के पास में ही वेश्याओं के घर है ने ही गांव वालों ने इस बात के बारे में बताया। उन्होंने तो पूरे गांव में भिक्षा मांगने को कहा था। पंडित जी की  अब खैर नहीं थी। पंडित जी को बुलाया गया। जबकि पंडित जी बीच-बीच में कुछ कहना चाह रहे थे लेकिन गांव वालों ने पंडित जी की कुछ बात नहीं सुनी। और उन्हें अच्छी बुरी बातें सुन कर गांव से बाहर निकाल दिया।

सिख- दूसरे को अपनी बात कहने का अवसर देना चाहिए। तब जाकर निष्कर्ष निकलना चाहिए।

समाप्त

            लेखक - रमेश बाबू लोधा

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