DINESH KUMAR SARSHIHA 12 Nov 2024 आलेख धार्मिक #mahabharat#महाभारत 34171 0 Hindi :: हिंदी
महाभारत का महाकाव्य दो चचेरे भाइयों के वंश के बीच जटिल संघर्ष की कहानी है, जिसमें मुख्य रूप से पांडव और कौरव (धृतराष्ट्र के पुत्र) शामिल हैं। कहानी का आरंभ राजा शांतनु के वंश से होता है, जिनके दो पुत्र थे: भीष्म (वास्तव में उनके पुत्र नहीं थे, लेकिन उन्हें गोद लिया गया था) और विचित्रवीर्य। विचित्रवीर्य के पुत्रों में पांडु और धृतराष्ट्र प्रमुख थे। पांडु के पांच पुत्र थे—युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव—जिन्हें "पांडव" कहा गया। धृतराष्ट्र के सौ पुत्र थे, जिनमें दुर्योधन सबसे बड़ा था। इन सौ पुत्रों को "कौरव" कहा गया। पांडव और कौरवों के बीच हस्तिनापुर के राज्य के अधिकार का संघर्ष, महाभारत के युद्ध का कारण बना। कहानी की गहराई इस संघर्ष में छिपी है, जहाँ व्यक्तिगत स्वार्थ, पारिवारिक रिश्ते और नैतिक दुविधाएँ उभर कर आती हैं। पांडवों के पिता पांडु पर एक शाप लगा था, जिसके कारण वह संतान उत्पन्न नहीं कर सकते थे, अतः देवताओं की कृपा से पांडवों का जन्म हुआ। युधिष्ठिर धर्मराज के पुत्र, भीम पवन देव के, अर्जुन इंद्र के, और नकुल-सहदेव अश्विनीकुमारों के पुत्र माने जाते हैं। पांडवों को हमेशा देवताओं, ऋषियों और दैत्यों के शत्रु माने जाने वाले दानवों का आशीर्वाद प्राप्त रहा। दूसरी ओर, कौरवों का जन्म राक्षसी स्वभाव का प्रतीक है, और कई बार उन्हें मानव रूप में अवतरित दानव कहा गया। महाभारत के सबसे महत्वपूर्ण पात्रों में से एक भगवान कृष्ण हैं, जो वासुदेव और देवकी के पुत्र तथा यदुवंशी हैं। वे पांडवों के परम मित्र, मार्गदर्शक और अर्जुन के सारथी बनते हैं। कृष्ण केवल एक राजा नहीं, बल्कि विष्णु के अवतार भी माने जाते हैं, जो धर्म की स्थापना के लिए पृथ्वी पर अवतरित हुए। उनका लक्ष्य पांडवों को उचित मार्ग पर चलाकर अधर्म के विरुद्ध खड़ा करना था। कृष्ण का चरित्र महाभारत में धर्म, न्याय और कर्तव्य का प्रतीक है। महाभारत का महान युद्ध, जिसे "कुरुक्षेत्र युद्ध" कहा गया, उस संघर्ष का चरम है, जिसमें धर्म और अधर्म के मध्य भीषण युद्ध हुआ। महाभारत का एक और विशेष भाग है "भगवद गीता," जो कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन और कृष्ण के बीच का संवाद है। इस संवाद में अर्जुन अपने कर्तव्यों, पारिवारिक रिश्तों और धर्म के संबंध में संशय में पड़ जाते हैं। तब कृष्ण उन्हें "गीता" का उपदेश देते हैं, जो जीवन, कर्तव्य और धर्म का सार समझाता है। गीता के माध्यम से भगवान कृष्ण ने कर्मयोग, भक्ति योग और ज्ञान योग की महिमा को समझाया। गीता का मुख्य संदेश है कि हर व्यक्ति को अपने कर्तव्य का पालन निष्काम भाव से करना चाहिए, और इसके परिणामों की चिंता किए बिना अपने कर्म करते रहना चाहिए। इस संवाद में धर्म, अधर्म, कर्म, और जीवन-मृत्यु के रहस्यों पर प्रकाश डाला गया है। महाभारत के युद्ध में भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा, शकुनि, जैसे महान योद्धा और रणनीतिकार कौरवों के पक्ष में थे, जबकि पांडवों के पक्ष में कृष्ण, अर्जुन, भीम, युधिष्ठिर और अन्य योद्धा शामिल थे। युद्ध में रणनीति, छल, नैतिकता, प्रेम और बलिदान के विविध रंग देखने को मिलते हैं। इस युद्ध में कई विभाजनकारी घटनाएँ होती हैं, जैसे अभिमन्यु का मरण, द्रौपदी का चीरहरण, कर्ण और अर्जुन का द्वंद्व, भीष्म का वध, जो महाभारत को भावनात्मक और नैतिक रूप से अत्यधिक शक्तिशाली बनाते हैं। महाभारत का अंत कौरवों की हार के साथ होता है और युधिष्ठिर को हस्तिनापुर का राजा घोषित किया जाता है। हालाँकि यह युद्ध पांडवों की जीत पर समाप्त होता है, परंतु यह जीत उन्हें अत्यधिक पीड़ा और दुख भी देती है। महाभारत यह सिखाता है कि धर्म का पालन ही जीवन का सार है और यह कि हर क्रिया का फल निश्चित होता है। महाभारत में अनेक उपकथाएँ, अनेक चरित्रों के व्यक्तिगत संघर्ष और उनके नैतिक परीक्षण हैं, जो इसे एक विशाल और जटिल महाकाव्य बनाते हैं।
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