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मैं दिल्ली हूँ-दिल्ली का पुराना नाम इंद्रप्रस्थ

नरेंद्र भाकुनी 11 Aug 2023 आलेख समाजिक Dellhi, दिल्ली, Narendra modi, केजरीवाल, india, bollywood,,रामायण, पृथ्वीराज चौहान, संसद, 52030 0 Hindi :: हिंदी

"ये सिँहोँ का  वीर है
ये आन ,बान और शान है|
मौहम्मद गौरी का गला भेद गयो
क्योँकि ये पृथ्वीराज चौहान है|"

चाहे दूरी कैसी हो
बँधन तो अपने दिलोँ से जोड़ेँगेँ|
पृथ्वीराज चौहान के प्रेमी हम
तीर तो निशाने पर छोड़ेँगेँ|

"जनश्रुतियाँ है, कहानियां है
उस राजा की रानी में।
कुछ छोटी सी कहानियां है
भारत की राजधानी में।"

इतिहास के पन्नों में दिल्ली का पुराना नाम इंद्रप्रस्थ था, जोकि पांडवों की राजधानी थी। जो पहले एक खांडवप्रस्थ था जहां महान असुर मनु ने भी शासन किया था।

"मेरे कलम के अनुपम स्याही
कुछ और भी सीखना चाहती है।
उसी के तथ्य से
इतिहास लिखना चाहती है।"

कवि चंदवरदाई ने इतिहास के पन्नों में अपनी एक महाकाव्य जिसका नाम पृथ्वीराज रासो था उसमें दिल्ली का नाम मेदिनीपुर लिखा।

"ये  दिल्ली मेदनीपुर भी था
जहां चमक उठा जो सूर भी था।
कहीं कलम की आभा जाग उठी
मेरे पृथ्वीराज का नूर भी था।

कुछ इतिहासकार बताते हैं कि जो दिल्ली थी मौर्य वंश के यहां पहले शासक चित्रांगद का शासन था बाद में तोमर वंश के राजा ध्रुव ने शासन किया था।जनश्रुतियाँ  कहते हैं कि यहां पर जो राजा थे उन का लौह स्तंभ ढीला था जिसके कारण इसका नाम दिल्ली पड़ गया और कुछ कहानीकार बताते हैं कि यहां के जो सिक्के चलाए जाते थे उनको देहलीवाल कहते थे जिसके कारण इसका नाम भी दिल्ली पड़ गया।

"ना  गोरों की ना कालों की
यह दिल्ली है दिलवालों की।"

दिल्ली पांडवों की प्रिय नगरी इन्द्रप्रस्थ के रूप में जानी जाती रही है। कुरूक्षेत्र के युध्द के बाद जब हस्तिनापुर पर जब पांडवों का शासन हुआ तो बड़े भाई युधिष्ठिर ने भाईयों को खंडवाप्रस्थ का शासक बनाया जिसकी भूमि बहुत ही बियाबान और बेकार थी, तब मदद के लिए श्रीक्रष्ण नें इन्द्र को बुलावा भेजा, खुद युधिष्ठिर की मदद के लिए इन्द्र नें विश्वकर्मा को भेजा,विश्वकर्मा नें अपने अथक प्रयासों से इस नगर को बनाया और इसे इन्द्रप्रस्थ यानी कि इंद्र का नगर ।

""कितनी भी अरमान रह गए
आज भी गाओ प्यारे तुम।
ये सुंदर थी भव्य नगरी
स्वागत होती केसर _ कुमकुम।""

यह वही राज्य है जहां राजा युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया था तथा भगवान श्री कृष्ण यहां आते जाते थे राजा युधिष्ठिर के शासनकाल में प्रजा बहुत प्रसन्न थी।
जब राजा युधिष्ठिर राजसुय यज्ञ कर रहे थे , वहां पर उपस्थित सभी ब्राह्मण , ऋषिगण राजा युधिष्ठिर की प्रशंसा कर रहे थे ऐसा सुनकर उनके मन में एक बात आई कि मेरे बराबर कोई दानी नहीं है और कृष्ण भगवान ये ग्लानि से भर उठे कि किसी राजा के मन में अभिमान नहीं आना चाहिए । तभी अचानक वहां पर एक आधा सुनहरा नेवला दिखाई दिया, और उसने कहा  रुकये महाराज  ।

वहां पर उपस्थित सभी ब्राह्मण राजा युधिष्ठिर श्री कृष्ण तथा राजा युधिष्ठिर के और भाई अचरज में पड़ गए। सभी ने पूछा _  " आप कौन हैं और यहां अकारण आने का प्रयोजन क्या है?

तब उस नेवले ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया _ हे राजा युधिष्ठिर मैं एक एक नेवला हूं, मैं आपको एक छोटी सी कहानी सुनाता हूं। एक समय की बात है एक ब्राह्मण परिवार साथ रहता था जो ब्राहमण था उसके साथ उसके पुत्र पुत्र वधू और उसकी पत्नी साथ रहती थी।

ये एक हंसता _ खेलता परिवार था लेकिन सुख के साथ दुख भी होता है और एक बार उसके गांव में बहुत ही बड़ा अकाल पड़ गया वहां खाने के लिए रोटी और सब्जी कुछ नहीं मिलता था ।

जो ब्राह्मण थे वो कहीं दिनों तक भूखे रहे, बड़ी ही मुश्किल से उन्हें कहीं पर थोड़ी सी ज्वार मिल गई और उन्होंने खाने के लिए जैसे ही निवाला अपने मुंह पर रख रहे थे बाहर से आवाज आई, मुझे खाना दे दो मैं कई दिनों से भूखा हूं उस गरीब ब्राह्मण परिवार ने उनका आवभगत किया पहले जो बुजुर्ग ब्राह्मण थे उन्होंने अपना भोजन उस भिक्षुक को दे दिया, लेकिन उससे उसका पेट नहीं भरा और फिर ब्राह्मण के पुत्र ने अपना भोजन उसे दे दिया फिर भी उसकी भूख शांत नहीं हुई बाद में उसकी पत्नी तथा पुत्र वधू ने भी अपना भोजन उस भिक्षुक को दे दिया।

बाद में पता चला कि जो भिक्षुक के रूप में आए हैं  वे स्वयं
धर्मराज हैं उन्होंने उनकी एक परीक्षा ली थी और उनको जिंदा स्वर्ग ले गए बाद में उसी स्थान पर मैं वहां पर आ गया तथा जो बचा कुचा भोजन था उसको खाया जिससे मेरा आधा शरीर सुनहरा हो गया तभी मैं आपके दरबार माया और मैंने ऐसा देखा कि आप में केवल अभिमान था इसलिए संभवत मेरा शरीर जो आधा था वो सुनहरा नहीं हुआ।

अपना भोजन जिसने दिया था
 वो सच्चा है दानवीर।
आपके मन में अहम भरा है 
पर वह सच्चा है कर्मवीर।

इससे युधिष्ठिर को ग्लानि हुई और उन्होंने स्वयं कहा आखिर वही सच्चा ब्राह्मण है जिसके पास कुछ ना होते हुए भी एक भूखे को भोजन कराया।

उड़ गई मेरी बाधा सारी
सारा दंभ अभिमान।
उस दानवीर को याद करूं मैं
उसे मिल गया सम्मान ।

इसी दिल्ली में पांडवों ने अश्वमेध यज्ञ करवाया और राजा परीक्षित का  ये कर्मभूमि भी रहा, दिल्ली से जुड़ी कई कहानियां हैं कहते हैं कि राजा राजा अनंगपाल से  कई ज्योतिषाचार्य ने कहा था यहां जो कील है वह साधारण कील नहीं हैं जब तक वह कील यहां पर धंसी हुई है तब तक कोई इसे खिला भी नहीं सकता क्योंकि यह कील शेषनाग के फल  धंसी हुई है।
 राजा अनंगपाल को विश्वास नहीं आया और उसने अपने सिपाहियों के द्वारा उस कील को निकाल लिया कहते हैं कि उस कील पर खून लगा था बाद में राजा ने बहुत प्रयास किया उस कील को वहां पर धसने के लिए लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।

इस दिल्ली में बाद में सात सल्तनत मुस्लिम की थी जिन्होंने लगभग सात सौ वर्ष राज किया निजामुद्दीन औलिया जिनके शिष्य अर्थात शागिर्द अमीर खुसरो थे इसमें एक कहावत भी बन जाती है  हनुज ए दिल्ली दूरस्थ अर्थात दिल्ली अभी दूर है। उसके लिए एक कहानी भी है वह कहानीबार तुगलक कहीं से लौट रहा था। बीच रास्ते से ही उसने सूफी हजरत निजामुद्दीन तक संदेश भिजवा दिया कि उसकी वापसी से पहले औलिया दिल्ली छोड़ दें। खुसरो को इस बात से तकलीफ हुई। वे औलिया के पास पहुंचे। तब औलिया ने उनसे कहा कि हनूज दिल्ली दूरस्त। यानी दिल्ली अभी दूर है। तुगलक के लिए दिल्ली दूर ही रह गई। रास्ते में उसके पड़ाव और स्वागत के लिए लकड़ी के पुल पर शाही खेमा बनवाया गया था। लेकिन रात को ही भयंकर अंधड़ से वह टूट कर गिर गया और तुगलक की वहीं दबकर मौत हो गई।

दिल्ली को एक बार राजधानी बदलकर दौलताबाद अर्थात देवगिरी भी बनाया गया लेकिन यह दिल्ली फिर दिल्ली आई... दौलताबाद शिव बदलकर फिर से दिल्ली आई।

अंग्रेजों के शासन काल में पहले राजधानी कोलकाता थी बाद में फिर से १९११में देश की राजधानी बनी।

किसी ने मुझसे कहा हो तुम
दिल्ली में हूं, दिल्ली में हूं।
लगा कहीं पर कोई निशाना
दिल्ली में हूं ,दिल्ली में हूं।
सबकी बदलती तकदीर यहां पर
दिल्ली में हूं, दिल्ली में हूं।
हमारी दिल्ली, तुम्हारी दिल्ली
दिल्ली में हूं ,दिल्ली में हूं।
मेरी फितरत, तुम्हारी दिलेरी 
दिल्ली में हूं, दिल्ली में हूं।

इस दिल्ली में कई स्वाधीनता संग्राम भी लड़े गए जिसमें मुख्य भूमिका सुभाष चंद्र बोस जी का योगदान रहा उनका यह मानना था कि यदि कोई देश जो हमारे शत्रु देश का शत्रु है तो वह हमारा परम मित्र है यह उनका एक दर्शन था जोकि जर्मन के तानाशाह से मिलने गए। जब सुबह चंद्र बोस जर्मनी के चांसलर हिटलर के वहां पहुंचे तो वहां कई प्रकार के हिटलर से अर्थात हिटलर के बहरूपिये लेकिन नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने उनसे कहा मुझे केवल हिटलर से ही मिलना है फिर बाद में एक व्यक्ति आया जिसने उनके कंधे पर हाथ रखा तब उसने कहा हेलो बोस  तब वो पहचान गए हिटलर आश्चर्यचकित हो गया।

उसने कहा कि" आपने मुझे कैसे पहचाना ?
नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने उत्तर दिया _"और सब आप से अलग थे क्योंकि और मुझसे सीधे हाथ मिला रही थी जोकि मैं परतंत्र देश से आया हूं लेकिन जब आप आए तब आपने सीधे मेरे कंधे पर हाथ रखा। नेताजी का यह कथन था कि भीख में मांगी गई आजादी को आजादी नहीं  कहते हैं, बल्कि आजादी को छीन ना पड़ता है।

उन्होंने एक नारा दिया था" दिल्ली चलो"

सुदूरवर्ती दक्षिण , पूर्व पश्चिम और उत्तर सभी जगह से जनसैलाब दिल्ली में ही उम्र भर सा है चाहे वह आशिकों का जमघट हो चाहे युवाओं का जुनून चाहिए उनको दिल्ली ही।

मैं खुली हवा का झोंका हूं
आगाज करूंगा दिल्ली में।
मैं युवा क्रांति का सिंह राज
परवाज करूंगा दिल्ली में।
मुझे किसी बात का खौफ नहीं
मैं बाद करूंगा दिल्ली में।

नरेंद्र भाकुनी (एम. ए. हिंदी , एम. ए. इतिहास)  , बी . एड

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