Mohan pathak 22 Nov 2025 आलेख अन्य एक जीवंत संस्मरण 7211 0 Hindi :: हिंदी
मेरा साथी पेड़ - एक जीवंत संस्मरण हमारे घर के छोटे से बगीचे में एक बड़ा, हरा-भरा आम का पेड़ था। उसकी जड़ें मानो घर की नींव से जुड़ी थीं। बचपन में उसकी छाया में खेलना, उसकी डालियों पर झूलना यह सब मेरे दिन का सबसे प्रिय हिस्सा था। उसी बगीचे में दादाजी ने अपने हाथों से एक छोटा आम का पौधा लगाया था। मैं रोज़ उसके पास जाता, उसकी मिट्टी कुरेदता, कभी पानी डालता। लगता जैसे वह पौधा मुझसे बातें करता हो। उसकी नन्ही पत्तियाँ हवा में हिलतीं तो मैं समझता, वह मुझ पर मुस्करा रहा है। हम दोनों जैसे दो साथी बन गए थे,एक इंसान और एक पौधा। धीरे-धीरे मैंने देखा जेठ की दोपहर में जब धूप धरती को झुलसाने लगती, तब वह बड़ा पेड़ अपनी छाया उस नन्हे पौधे पर फैला देता। बरसात में उसकी डालियाँ छाता बन जातीं। और जब आंधी आती, तो वह अपनी फैली शाखाओं से उसे ढककर बचा लेता। मुझे लगता, जैसे यह बगीचा भी रिश्तों का घर है।जहाँ बड़ा हमेशा छोटे की रक्षा करता है। समय बीता। मैं बड़ा हुआ, वह छोटा पौधा भी अब एक सुन्दर वृक्ष बन गया। दादाजी अब नहीं रहे, पर हर बसंत में जब वह पेड़ फूलों से लद जाता, तो लगता जैसे दादाजी फिर लौट आए हों। एक दिन देखा,अब वह पेड़ भी अपने साये से बगीचे में उग रहे नए पौधों को धूप से बचा रहा था। मुझे लगा, यही तो जीवन का चक्र है। दादाजी ने मुझमें स्नेह बोया, मैंने उस पेड़ में, और अब वह आगे बाँट रहा था। पर एक दिन कुछ बदला। तेज़ आँधी आई। वह पुराना बुजुर्ग पेड़ जिसने कभी इस बगीचे को जीवन दिया था ज़मीन से उखड़ गया। बाकी पेड़ों ने कुछ नहीं किया। यहाँ तक कि मेरा साथी, वह युवा पेड़ भी चुप रहा। मुझे उस पर क्रोध आ रहा था। दिन बीतते गए। मैं पढ़ाई और जिम्मेदारियों में उलझ गया। एक दिन छुट्टी पर जब बगीचे पहुँचा तो देखा। मेरा साथी पेड़ कुछ सूख गया है। उसकी पत्तियाँ धूल से ढकी हैं। वह अब मुस्करा नहीं रहा था। लगा जैसे कह रहा हो “क्यों नाराज़ हो, इतने दिन बाद आए हो। अपने साथी की अब याद नहीं आती। " मैंने धीरे से कहा, “भाई, अब मैं बड़ा हो गया हूँ... घर और काम दोनों संभालने हैं।” उसने कुछ नहीं कहा, बस दो पत्तियाँ गिरा दीं। तब मैं समझ नहीं पाया कि यह मौन शिकायत थी या स्नेह की पुकार। समय फिर बीत गया। नौकरी की तलाश में भटकते हुए थका-हारा जब लौटा, तो वह पेड़ मुझे देखकर झूम उठा। उसने एक फल गिराया, जैसे कह रहा हो “ले, यह छोटा-सा उपहार मेरे भाई के लिए।” मैंने फल खाया, मन को जैसे ठंडक मिल गई। पेड़ बोला “मुसीबत में हो, मेरे फल बेच दो, कुछ पैसे मिल जाएँगे।” वह दिन था जब मैंने पहली बार महसूस किया कि पेड़ भी मित्र होता है।निःस्वार्थ और सच्चा। कई साल गुजर गए। मेरा विवाह हुआ, परिवार बढ़ा, ज़िम्मेदारियाँ बढ़ीं। एक दिन फिर उस बगीचे में गया। पेड़ अब विशाल हो चुका था।ठीक अपने बुजुर्ग की तरह। मैंने कहा,“अब तो तुम भी बड़े हो गए हो।” वह मुस्कराया और कुछ पत्तियाँ गिराईं। मैंने अपनी परेशानी बताई रोज़ी कम है, खर्च ज़्यादा।वह बोला, “मेरी टहनियाँ काट लो, बेच दो, कुछ सहारा मिल जाएगा।” मैंने वैसा ही किया। वह ठूँठ बन गया, पर मेरी मुश्किल हल हो गई। अब जीवन के उत्तरार्ध में जब मैं फिर लौटा, तो देखा। वही ठूँठ बगीचे के कोने में अकेला खड़ा है। न फल, न पत्तियाँ, न पक्षियों का बसेरा। उसने कहा “मित्र, अब मेरे पास देने को कुछ नहीं रहा।अब मैं असहाय हूँ, जो कुछ था, दे चुका हूँ।” मैंने उसे गले से लगा लिया। और कहा,“मुझे अब कुछ नहीं चाहिए, बस तुम्हारा साथ चाहिए।” उसी पल मुझे लगा उसकी सूखी टहनियों पर हल्की हरियाली झलक उठी। जैसे वह फिर से जी उठा हो। मेरी आँखें नम थीं। वह केवल एक पेड़ नहीं था, मेरा साथी था, मेरे जीवन का साक्षी था। आज जब मैं यह लिख रहा हूँ, वह पेड़ अब भी वहाँ है मौन, किंतु सजीव। उसकी छाया में बैठते हुए लगता है जीवन यही है — देना, मिट जाना, और फिर किसी के भीतर अंकुर बनकर उग आना।