डॉ राजेंद्र यादव आजाद 03 May 2026 आलेख समाजिक 6157 0 Hindi :: हिंदी
**पंखों पर जाली, या सिस्टम की नाकामी पर पर्दा? — कोटा से उठता कड़वा सच** कोटा से आई एक वायरल वीडियो ने मन को झकझोर दिया है। हॉस्टल के कमरों में लगे पंखों को लोहे की जाली से ढक दिया गया है, ताकि छात्र आत्महत्या न कर सकें। पहली नज़र में यह कदम संवेदनशील और सराहनीय लगता है—मानो किसी ने समय रहते एक ज़िंदगी बचाने की कोशिश की हो। सोशल मीडिया पर इसे “सुरक्षा का नया मॉडल” कहा जा रहा है, और तालियों की कमी नहीं है। लेकिन ज़रा ठहरकर सोचिए—क्या सच में यह समाधान है, या फिर यह हमारी उस असहज सच्चाई पर डाला गया पर्दा है, जिसे हम देखना ही नहीं चाहते? पहली नज़र में यह कदम संवेदनशील लगता है। आखिर, अगर एक साधन हटाने से किसी की जान बच सकती है, तो उसमें बुराई क्या है? लेकिन यही सोच हमें एक खतरनाक सुकून भी देती है—ऐसा सुकून, जो असली समस्या से ध्यान हटा देता है। क्योंकि आत्महत्या केवल एक तरीका नहीं, बल्कि एक मानसिक स्थिति का परिणाम है। अगर एक छात्र उस स्थिति तक पहुँच चुका है, तो क्या सच में लोहे की जाली उसके मन के तूफान को रोक पाएगी? कोटा, जिसे देश की कोचिंग राजधानी कहा जाता है, आज एक और पहचान से जूझ रहा है—दबाव की राजधानी। हर साल लाखों छात्र यहाँ अपने सपनों को लेकर आते हैं, लेकिन उन्हीं सपनों का बोझ कई बार उनकी साँसों पर भारी पड़ जाता है। आंकड़े इस सच्चाई को और नंगा कर देते हैं। वर्ष 2023 में लगभग 26 छात्रों ने यहाँ आत्महत्या की। 2024 में भी यह संख्या 20 से ऊपर रही। 2025 में भी हालात में कोई ठोस सुधार नहीं दिखा, और 2026 के शुरुआती महीनों में भी ऐसी घटनाओं की खबरें सामने आती रही हैं। ये सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, बल्कि हर संख्या के पीछे एक टूटा हुआ घर और एक अधूरी कहानी छिपी है। अगर इस समस्या को राष्ट्रीय स्तर पर देखें, तो तस्वीर और भी डरावनी हो जाती है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार, 2022 में भारत में 1.64 लाख से अधिक लोगों ने आत्महत्या की। हाल के रुझान बताते हैं कि 2025 तक यह संख्या 1.7 से 1.8 लाख के बीच पहुँच चुकी है। 2026 के शुरुआती संकेत भी किसी बड़े बदलाव की ओर इशारा नहीं करते। इनमें बड़ी संख्या युवाओं और छात्रों की है, जो इस मुद्दे को और गंभीर बना देता है। सवाल यह है कि हम आखिर किस दिशा में जा रहे हैं? क्या हम ऐसी व्यवस्था बना रहे हैं जहाँ हर खतरे को लोहे से ढक दिया जाए? या हम उस सोच को बदलने की कोशिश करेंगे, जो एक बच्चे को इस कदर तोड़ देती है कि उसे जीना ही बेकार लगने लगता है? सच यह है कि समस्या कहीं गहरी है। यह उस शिक्षा प्रणाली में छिपी है, जहाँ अंकों को इंसान से ज्यादा महत्व दिया जाता है। यह उस समाज में है, जहाँ असफलता को एक अंत की तरह देखा जाता है। यह उन उम्मीदों में है, जो माता-पिता अनजाने में अपने बच्चों पर थोप देते हैं। और यह उस चुप्पी में है, जहाँ मानसिक स्वास्थ्य पर बात करना आज भी कमजोरी समझा जाता है। पंखों पर जाली लगाना एक तात्कालिक उपाय हो सकता है, लेकिन यह समाधान नहीं है। समाधान तब शुरू होगा, जब कोचिंग संस्थानों में पढ़ाई के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य को भी प्राथमिकता दी जाएगी। जब छात्रों के लिए काउंसलिंग और संवाद के दरवाजे खुले होंगे। जब माता-पिता यह समझेंगे कि हर बच्चा एक रैंक नहीं, बल्कि एक इंसान है। और जब असफलता को जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक पड़ाव माना जाएगा। आख़िर में सवाल बहुत सीधा है—अगर हमें हर पंखे पर जाली लगानी पड़ रही है, तो क्या यह हमारी जीत है या हमारी हार? क्या यह सुरक्षा है, या उस सच्चाई से भागना है जिसे हम स्वीकार नहीं करना चाहते? जब तक हम इन सवालों का सामना नहीं करेंगे, तब तक हर जाली के पीछे एक खामोश चीख़ छिपी रहेगी। और तब तक, हम समाधान नहीं, सिर्फ़ दिखावा करते रहेंगे। **सोनिका पंवार सवेरा**
डॉ राजेंद्र यादव आजाद 12 अगस्त 1971 बेवल ज�...