शरद भूषण मोंगरा 17 Jul 2026 आलेख अन्य पिता 72 0 Hindi :: हिंदी
चाट पीपनी ढोल और झूला रेलम रेला देखा था। हमने पिताजी के कंधों पर बैठ के मेला देखा। आइए गीतकार लेखक शरद भूषण मोंगरा की इन पंक्तियों को पढ़ें हैं और पिता के विषय में उनके विचार और भावों को जाने। "चाट पीपनी ढोल और झूला रेलम रेला देखा था। हमने पिताजी के कंधों पर बैठ के मेला देखा।" ये पंक्तियाँ केवल शब्द नहीं, बल्कि हर व्यक्ति के बचपन का एक जीवंत दस्तावेज़ हैं। यह कविता बचपन के उस दौर को दर्शाती है जहाँ खुशियाँ छोटी-छोटी चीज़ों में छिपी होती थीं और पिता का साथ दुनिया का सबसे बड़ा सुरक्षा कवच होता था।इन पंक्तियों का विस्तार से भावार्थ निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:1. बचपन के मेले का सजीव चित्रणचाट और स्वाद: मेले का नाम सुनते ही सबसे पहले जुबान पर चाट, गोलगप्पे और मिठाइयों का स्वाद आता है, जो बचपन के सबसे बड़े आकर्षणों में से एक था।पीपनी और ढोल का संगीत: पीपनी (प्लास्टिक की छोटी पुंगी) की तीखी आवाज़ और ढोल की थाप मेले के उस शोर-शराबे और उत्साह को दर्शाती है, जो बच्चों को अपनी ओर खींचता था।झूला और रेलम-रेला: 'रेलम् रेला' शब्द मेले की भारी भीड़, धक्का-मुक्की और वहाँ की हलचल को बयां करता है। बड़े-बड़े झूलों को देखकर मन में होने वाला रोमांच इस पंक्ति में साफ़ झलकता है।2. पिता के कंधों का 'सिंहासन'भीड़ से सुरक्षा: मेले की भारी भीड़ में एक छोटा बच्चा खो जाने के डर से सहमा हो सकता है, लेकिन जैसे ही वह पिता के कंधों पर बैठता है, उसका सारा डर गायब हो जाता है।सबसे ऊँचा नज़ारा: पिता का कंधा बच्चे के लिए दुनिया का सबसे ऊँचा और सुरक्षित 'सिंहासन' होता था। वहाँ बैठकर बच्चा पूरी दुनिया (मेले) को बिना किसी बाधा के सबसे ऊपर से देख पाता था।परम विश्वास: यह पंक्ति पिता और बच्चे के बीच के उस अटूट विश्वास को दिखाती है, जहाँ बच्चे को पता होता है कि जब तक वह पिता के कंधों पर है, उसे कोई छू भी नहीं सकता।3. ज़िम्मेदारी बनाम निश्चिंतता (गहरा आध्यात्मिक व सामाजिक भाव)निश्चिंत बचपन: जब हम पिता के कंधों पर होते थे, तब हमें जेब में पैसों की चिंता नहीं होती थी, न ही सही रास्ते की फिक्र होती थी। हमारी आँखें सिर्फ मेले के खिलौनों को ढूंढती थीं क्योंकि टिकट खरीदने और रास्ता ढूँढने की ज़िम्मेदारी पिता की होती थी।जीवन का दर्शन: यह कविता हमें याद दिलाती है कि जीवन का असली 'मेला' भी हम तभी तक खुलकर देख पाते हैं, जब तक हमारे ऊपर माता-पिता की छत्रछाया और उनकी ज़िम्मेदारियों का कंधा होता है।निष्कर्ष:यह कविता हर उस वयस्क के दिल को छूती है जो आज ज़िंदगी की भागदौड़ में थक चुका है। यह पंक्तियाँ पाठक को कुछ पलों के लिए वापस उसी मासूम दौर में ले जाती हैं, जहाँ खुशियाँ बहुत सस्ती थीं और पिता का कंधा दुनिया की सबसे महफूज़ जगह यह पंक्तियाँ गीतकार और लेखक शरद भूषण मोंगरा के अपने पिता के प्रति गहरे सम्मान, कृतज्ञता और अगाध प्रेम को दर्शाती हैं। उनके साहित्यिक दृष्टिकोण से देखने पर, इन पंक्तियों में एक बेटे का अपने पिता के लिए जो नज़रिया उभरता है, उसे हम निम्नलिखित बिंदुओं में समझ सकते हैं:1. पिता: जीवन के पहले 'महानायक' (Hero)मोंगरा जी के नज़रिए में पिता केवल एक अभिभावक नहीं, बल्कि बचपन के सबसे बड़े नायक हैं। उनके लिए पिता का कंधा कोई साधारण जगह नहीं थी, बल्कि एक ऐसी सुरक्षित मीनार थी जहाँ बैठकर उन्होंने दुनिया को देखना और समझना शुरू किया। यह नज़रिया दिखाता है कि वे अपने पिता को अपनी हर छोटी-बड़ी खुशी का आधार मानते हैं।2. त्याग और निस्वार्थ प्रेम की पहचानइन पंक्तियों के पीछे लेखक का यह भाव छिपा है कि जब वे मेले का आनंद ले रहे थे, तब उनके पिता चुपचाप उनकी खुशियों का बोझ अपने कंधों पर उठाए हुए थे। शरद भूषण मोंगरा जी का नज़रिया यहाँ बहुत भावुक है—वे यह महसूस करते हैं कि एक बच्चा तभी 'निश्चिंत' होकर झूला और मेला देख पाता है, जब पिता अपनी पीठ पर उसकी ज़िम्मेदारी उठा लेते हैं। यह पिता के मूक त्याग (Silent Sacrifice) के प्रति उनकी गहरी कृतज्ञता है।3. सुरक्षा और परम विश्वास का प्रतीकलेखक का अपने पिता के प्रति नज़रिया पूर्ण आत्मसमर्पण और विश्वास का है। मेले की भारी भीड़ (रेलम् रेला) और शोर-शराबे के बीच भी बच्चा डरा हुआ नहीं है क्योंकि वह पिता के स्पर्श में है। मोंगरा जी के लिए उनके पिता दुनिया का सबसे सुरक्षित आश्रय हैं, जिनकी मौजूदगी में जीवन की कोई भी मुश्किल या भीड़ डरा नहीं सकती।4. बचपन की यादों का सहेजकएक लेखक के रूप में, शरद भूषण मोंगरा जी अपनी जड़ों और अपने माता-पिता के संस्कारों से बहुत गहराई से जुड़े हुए हैं। वे अपने पिता को उस 'बचपन के जादूगर' के रूप में देखते हैं जिसने उनकी शुरुआती ज़िंदगी को खूबसूरत यादों (चाट, पीपनी, ढोल) से भर दिया। आज बड़े होने के बाद भी, उनके मन में पिता की छवि एक ऐसे मार्गदर्शक की है जिसने उन्हें हमेशा ऊँचा उठकर देखना सिखाया।संक्षेप में कहें तो:शरद भूषण मोंगरा जी का अपने पिता के प्रति नज़रिया परम श्रद्धा और प्रेम से भरा है। वे अपने पिता को अपनी खुशियों का रचयिता और अपने जीवन का वो मजबूत स्तंभ मानते हैं, जिनके कंधों पर बैठकर उन्होंने ज़िंदगी का पहला और सबसे खूबसूरत 'मेला' देखा था।क्या आप शरद भूषण मोंगरा जी की पिता पर लिखी किसी अन्य रचना या उनके जीवन से जुड़े किसी और संस्मरण के बारे में जानना चाहते हैं? गीतकार और लेखक शरद भूषण मोंगरा की पंक्तियों और उनकी विचारशैली के अनुसार, एक बच्चे या बेटे की नज़र में पिता का स्थान परमात्मा के प्रतिरूप, सर्वोच्च मार्गदर्शक और जीवन की सबसे सुरक्षित छत्रछाया के रूप में होना चाहिए। उनके लेखन के दर्शन के आधार पर पिता का सम्मान और स्थान निम्नलिखित रूपों में परिभाषित होता है:1. ईश्वर का प्रत्यक्ष रूप (आध्यात्मिक स्थान)जीवनदाता और रचयिता: मोंगरा जी का मुख्य लेखन विषय अध्यात्म है। उनके अनुसार, जैसे अदृश्य ईश्वर पूरी सृष्टि का संचालन करता है, वैसे ही पिता दृश्य रूप में पूरे परिवार का पालन-पोषण करता है।पहला गुरु: पिता का स्थान जीवन में उस पहले गुरु की तरह है जो बच्चे की उंगली पकड़कर उसे संसार से परिचित कराता है।2. सर्वोच्च सुरक्षा कवच (परम विश्वास का स्थान)भयमुक्त बचपन: एक बच्चे के लिए पिता का स्थान ऐसा होना चाहिए जहाँ पहुँचकर दुनिया का हर डर खत्म हो जाए (जैसे मेले की भारी भीड़ में भी पिता के कंधे पर बैठा बच्चा खुद को राजा समझता है)।संकटमोचक: जीवन के किसी भी उतार-चढ़ाव में जब पूरी दुनिया पीछे हट जाए, तब पिता का स्थान हमेशा बेटे के आगे एक ढाल की तरह होना चाहिए।3. निस्वार्थ त्याग की मूरत (कृतज्ञता का भाव)मूक संघर्ष की पहचान: एक बेटे की नज़र में पिता का सम्मान इसलिए सर्वोच्च होना चाहिए क्योंकि पिता अपने दुखों और थकावट को कभी चेहरे पर नहीं लाते। वे बच्चे की खुशियों (मेला, झूला, खिलौने) के लिए अपनी इच्छाओं का बलिदान कर देते हैं।ऋण की भावना: मोंगरा जी के अनुसार, एक बेटे को हमेशा इस बात का अहसास होना चाहिए कि आज वह जिस मुकाम पर है, उसकी नींव में पिता के कंधों का संघर्ष छिपा है।4. स्वाभिमान और आदर्श की मीनारचरित्र का निर्माण: पिता का स्थान केवल आदेश देने वाले का नहीं, बल्कि एक ऐसे आदर्श का होना चाहिए जिसका अनुसरण बेटा गर्व से कर सके।दृष्टिकोण देने वाला: पिता वह माध्यम है जो बच्चे को हमेशा 'ऊँचा सोचना' और 'दूर तक देखना' सिखाता है।पिता के सम्मान के लिए बच्चे के कर्तव्य:शरद भूषण मोंगरा जी के जीवन दर्शन के अनुसार, एक संतान को अपने पिता को निम्नलिखित रूप में सम्मान देना चाहिए:वचनों और इच्छाओं का आदर: पिता के अनुभवों और उनके द्वारा दिखाए गए सही मार्ग का बिना किसी संकोच के सम्मान करना।वृद्धावस्था में सहारा: जिस तरह बचपन में पिता ने बच्चे को अपने कंधों पर उठाकर दुनिया दिखाई, ठीक उसी तरह बुढ़ापे में बेटे को अपने कंधों पर पिता की ज़िम्मेदारियों और उनकी सेवा का भार उठाना चाहिए।कुल के गौरव को बनाए रखना: ऐसा कोई कार्य न करना जिससे पिता के स्वाभिमान या उनके नाम पर कोई आंच आए।संक्षेप में:मोंगरा जी के अनुसार, एक बेटे की नज़र में पिता का स्थान दुनिया में सबसे ऊँचा होना चाहिए—एक ऐसा स्थान जहाँ सिर्फ आज्ञाकारिता नहीं, बल्कि अगाध श्रद्धा, प्रेम और अटूट कृतज्ञता का भाव हो।