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सजगता

AJAY KUMAR JOSHI 15 Feb 2025 आलेख समाजिक जोश, सजगता, आत्मविश्वाश, आध्यात्मिक 22614 0 Hindi :: हिंदी

सजगता : 
 सजगता अथार्थ आप जहाँ हो वहाँ की हर वस्तु और स्थिती के प्रति सजग रहना |  यह एक कला हे, जिससे जीवन में हर कार्य को कर करने और हर संकट का समाधान करने की शक्ति प्राप्त होती हे, क्योकि जब व्यक्ति सजग होता हे अथार्थ चेतन होता हे तो वो हर वस्तु या स्थिति का  सही सही  ज्ञान प्राप्त कर लेता हे | फिर चाहे कोई भी कार्य हो उसके लिए उस कार्य को करना बहुत ही आसन हो जाता हे |  यदि आप भी अपने जीवन को सफल और बाधा रहित बनाना चाहते हो तो आप को  जीवन में सजगता को प्राप्त करने के लिए थोडा प्रयास करना होगा | सजगता एकाग्रता का ही दूसरा रूप हे बस  थोडा क्रिया का फर्क हे |  एक छोटी सी घटना मैं अपने जीवन की आप सब के सामने व्यक्त करता हूँ जिस से आप सजगता को अच्छे से जान पाओगे |  कोलेज के समय की बात हे तब में मेरा प्रयास सजगता पर अच्छा चल रहा था और मैं हर समय पहले से जायदा जागरूक अपने आप को हर दिन पाता था | कोलेज इंटरवेल में हम सब मित्र एक थडी पर चाय नास्ता करने गये वहा तब कांच के गिलास में चाय दी जाती थी और बैठने के लिए टेबल कुसी का अच्छा इंतजाम था | पहले हमने नास्ता लिया और उसके बाद चाय पी  और  बातो के दोरान अचानक से एक मित्र का कांच का गिलास उसकी कोहनी की टक्कर से एक दम से नीचे गिरा जब वो गिलास जमीन पर टकराने वाला था उससे पहले ही मेने उसको अपने हाथो में पकड़ लिया और देखने वाले अचंभित निगाहों से मेरे को देख रहे थे | ये घटना इतनी तीव्र गति से हुई जितने समय में कोई सोच भी नहीं सकता , ये घटना मेरे को भी बहुत हेरान कर देने वाली थी क्योकि एसा मेने अपने जीवन में  कभी नहीं किया था और न कभी ये करने की सोची लेकिन सजगता के प्रयास से मेरे मन में उस गिलास को जमीन पर गिरने से बचाने की  इतनी तीव्र गति से प्रेरणा जगी  इससे पहेले में कुछ सोच पाता उससे पहले ही गिलास मेरे हाथ में था सभी विस्मय भरी निगाहों से मेरी तरफ देख रहे थे जैसे में कोई जादूगर हु |  लेकिन मेने अपने सजगता के प्रयासों को न बताते हुए मेने सब से इतना ही बोला की मेरे को भी पता नहीं की ये मेने केसे किया |   हमेशा अपनी विद्या को गुप्त रखना चाहिए जो आप कर रहे हो और जो आप करने वाले हो जिससे  आप के जीवन में नए परिवर्तन प्रसारित हो रहे हे एसी विद्या की जानकारी भूल कर भी सार्वजानिक नहीं करनी चाहए |  इन बातो की चर्चा या तो गुरु से करनी चाहिए या फिर योग्य शिष्य को ये ज्ञान देने हेतु इन सब बातो की चर्चा  करनी चाहिए  | अब प्रशन उठता हे की सजगता को केसे पाया जाय ? जैसा की मेने बताया की हमारा शरीर बहुत सारे रहस्यों को समेटे हुए हे इस को हम सतत अभ्यास से जैसा चाहे वेसा बना सकते हे |
अभ्यास १ : आप जहाँ पर हो वहा उपस्तिथ हर वस्तु को आलस्य रहित हो कर एक बार देखे , देखना इस कदर की आप को आप के आगे क्या वस्तुए रखी हुयी हे, पीछे कोन सी हे और दोनों अगल बगल में कोन कोन सी वस्तु रखी हे वो किस स्तिथि में हे उसका अच्छी तरह ज्ञान हो जाय, हर एक वस्तु को कम से कम प्रारंभ में ३से 4 सेकंड दे , देखलेने के बाद  कुछ क्षण के लिए अपनी आँखे बंद कर उन सब वस्तुओ को मन की आँखों से देखने का प्रयास करे , 5 मिनिट बाद फिर से उन्हें वेसे ही देखे  इस तरह आप थोड़ी थोड़ी देर में 3-4 बार प्रयास करे , ईस अभ्यास में ज्यादा समय न लगाये
कुछ दिनों बाद आप को बिना अभ्यास के ही अपनी आस पास वाली वस्तुओ की स्तिथि का ज्ञान होने लगेगा |
अभ्यास २. इस अभ्यास में आप को वस्तुओ पर ध्यान न दे कर अपने आस पास के व्यक्तियों की गतिविधि और बातो पर ध्यान देना हे | कोन आया किसने किससे किस के बारे में क्या कहा | इस तरह आप वातावरण की हर हरकत को सजगता और आलस्य रहित हो कर नोट करे , इस अभ्यास से आप को हर व्यक्ति के बारे में सही सही पता लगने लगेगा की उसके विचार केसे हे | वो सभी के प्रति केसा व्यवहार करने वाला हे , किस बात से वो प्रसन्न होता हे ,किस वस्तु में उसकी रूचि हे |
अब जब आप उस व्यक्ति से बात करे तो उसका जिन बातो में इंटरेस्ट हे वोही बात उससे करे ये ध्यान रखे | जिससे वो अपने आप को सहज महसूस कर पायेगा| आप भी उसकी बातो को सजगता पूर्ण सुने और अंत में अपनी बात रखे जिससे आप की बात का सकारात्मक प्रभाव उस पर पड़ पायेगा और आप की ये बात अंजाम तक पहुँच पाएगी |
हमारे शरीर में 70 प्रतिशत से अधिक पानी की मात्रा विद्यमान हे और पानी की प्रक्रति ये हे की उसको जिस पात्र में डाला जाता हे वो उसी का रूप धारण कर लेता हे | पानी का सम्बन्ध भावनाओ से भी हे जैसी हम पानी को भावना देते हे वो वेसा ही असर हमारे शरीर पर डालता हे | इसीलिए  गुस्से में दिया हुआ पानी कभी नहीं पीना चाहिए क्यों की उससे हमारा अहित ही होगा वो हम को बीमार भी कर सकता हे | हमारे यहाँ एक उदहारण देखने को मिलता हे जब किसी को पेट दर्द की शिकायत होती हे तो घर के आस पास  रहने वाला  जानकार एक गिलास में पानी को अभिमंत्रित करता हे अथार्थ यु कहे की वो उस पानी में बीमारी से निवृत होने की भावनाए डालता हे| जब रोगी को वो पानी पिलाया जाता हे तो वो राहत मासुस करता हे | जल तत्व हमारी प्रकृति का मुलभुत अंग हे इस का सम्बन्ध चन्द्रमा से हे चंद्रमा के घटने बदने के साथ व्यक्ति के  व्यवहार में भी परिवर्तन होता हे  जल ही जीवन हे हिन्दू संस्कृति के अन्दर जल को देवता माना गया हे और अधिकतर घरों में आज भी शाम को जल के रखने की जगह पर दिया लगाया जाता हे और वहा पवित्रता रखी जाती हे ताकि शरीर में गया पानी हर समय सात्विक उर्जा प्रदान करता रहे |

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