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स्वाभिमानी बने अभिमानी नहीं.

Anonymous 30 Mar 2023 आलेख अन्य Mritunjay kumar choudhary 78182 0 Hindi :: हिंदी

   स्वाभिमान अहम् के रोग का निदान है !स्वाभिमान शब्द आत्मगौरव और आत्मसम्मान के लिए प्रयुक्त होता है। यह ऐसा शब्द है जो हमें जाग्रत करता है, प्रेरित करता है और हमें कर्तव्य के प्रति आगे बढ़ने के लिए ललकारता है। स्वाभिमान हमारे अपने विश्वास को जाग्रत करता है। हमें जीवन मूल्यों के प्रति, अपने देश के प्रति, अपनी संस्कृति, अपने समाज और अपने कुल के प्रति स्वाभिमानी बनने की प्रेरणा देता है।
आम आदमी आमतौर पर अभिमान को ही स्वाभिमान समझ लेता है। जबकि स्वाभीमान की बात ही कुछ और है। स्वाभिमान विनम्र है। मैं दुसरे से श्रेष्ठ हूं, यह धारणा स्वाभिमानी में नहीं होता। न कोई किसी से बड़ा है न कोई किसी से छोटा है, स्वाभिमान इस बात की स्वीकृति देता है। 
स्वाभिमान में संघर्ष की क्षमता है। अभिमानी का प्रयास दुसरे को नीचा दिखाने का, दुसरे को चोट पहुंचाने का होता है। स्वाभिमानी का संघर्ष दुसरे को नीचा दिखाने के लिए नहीं, दुसरे का आक्रमण गलत है, यह दिखाने के लिए होता है। स्वाभीमान में कोई आक्रमण नहीं है। अभिमान दुसरे से अपने आप को श्रेष्ठ समझने का भाव है। अभिमानी हर उपाय सिर्फ इसलिए करता है, कि दुसरे उसे मान दे, उसकी उपेक्षा न हो। 

साधारण व्यक्ति जो भी करता है अपने अहम् को तुष्ट करने के लिए करता है। अभिमान सदा इस तलाश में रहता है, कि वो आँखें मिल जांए जो उसकी छाया को वजन दें। दुसरों पर आक्रमण या दुसरे से तुलना करने में अभिमान है। फलस्वरूप मनुष्य के दुखों का कारण भी उसका अभिमान ही है।स्वाभिमान व्यक्ति को स्वावलम्बी बनता है जबकि अभिमानी हमेशा दूसरों पर आश्रित रहना चाहता है। स्वाभिमान एवं अभिमान के बीच बहुत पतला भेद है। इन दोनों का मिश्रण व्यक्तित्व को बहुत जटिल बना देता है। दूसरों को कमतर आँकना एवं स्वयं को बड़ा समझना अभिमान है।एवं अपने मूलभूत आदर्शों पर बगैर किसी को चोट पहुंचाए बिना अटल रहना स्वाभिमान है। अभिमानी व्यक्ति अपने आपको स्वाभिमानी कहता है किन्तु उसके आचरण,व्यवहार एवं शब्दों से दूसरे लोग आहत होते हैं। अभिमानी अन्याय करता है और स्वाभिमानी उसका विरोध। स्वाभिमानी दूसरों का अधिपत्य खत्म करता है जबकि अभिमानी अपना अधिपत्य स्थापित करता है। रावण अभिमानी था क्योंकि वह सब पर अधिकार जमाना चाहता था ,कंस अभिमानी था क्योंकि वह आतंक के बल पर राज करना चाहता था। राम ने रावण के अधिपत्य को समाप्त किया तथा कृष्ण ने कंस के आतंक को ,इसलिए राम और कृष्ण दोनों स्वाभिमानी थे।अभिमान और स्वाभिमान पर्यायवाची शब्द नही है बल्कि एक प्रकार से विलोम शब्द है ।अभिमान इंसान को अंधकार में ले जाता है ,वही स्वभिमान प्रकाश की ओर बढ़ाता है । अभिमान पतन का कारण बनता है ,वही स्वाभिमान उत्थान का कारण है अभिमान नकारात्मक विचार है ,स्वाभिमान सकारात्मक भाव है ।

अभिमानी व्यक्ति सदैव असुरक्षा व भय की भावना से ग्रसित रहता है कि कोई उससे आगे ना बढ़ जाये इशलिये उसकी क्रैब मेंटिलिटी अर्थात केकड़ा प्रवित्ति हो जाती है ,जैसे ही उसे पता चलता है कि फला व्यक्ति उससे आगे बढ़ रहा है वह उसकी टांग खिंचाई में लग जाता है ।

स्वाभिमान ऐसा अजेय होता है स्वाभिमान जो न् डिगता है ,न् डरता है ,न हारता है ।

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