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Bholenath sharma
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वो कैसे होगे-क्या होगें वे भी हमारी तरह जो है आने वाले
कि गाँवों की गलियो से अपरिचित होगें आने वाले , यह सदीं की झलक बताती कैसे होगें आने वाले । सुख सुविधा �
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यूँ करना- कभी सोचता हूँ चलते चलते मैदान मैं
कभी सोचता हूँ बैठा दालान मै , कभी सोचता हूँ चलते - चलते मैदान मैं । जीवन मैं श्रम कितना करना होगा , जिनता अच्छा जीवन जीना होगा ।
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याद है वो दिन-किस्से बचपन के बड़े अनूठे
किस्से बचपन के बड़े अनूठे है बातो-बातो में हम तुमसे रूठे है कुछ पल खामोशी छा जाती थी फिर कुछ पल के बाद खामोशी लुप्त हो
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छात्रावस्था-कुछ बरस तक कुछ समय तक हम साथ थे
कुछ बरस तक कुछ समय तक हम साथ थे । बटँ गये राह क्योंकि सबके मंजिल अलग - अलग थे। जो आसपास के थे
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अपनापन-जो छोड़ गये तुम को तुम क्यो उनको अपना कहते हो
आत्मीयता खोकर भी तुम अपना कहते हो । जो छोड़ गये तुम को तुम क्यो उनको अपना कहते हो । जिन्हें प्रेम नहीं ह�
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बाँट-जो एक जीवन भर अन्त समय में में बाँटा
पले बढ़े जिनके आगे जिनकी गोदी मे खेले क्या वस्तु है वे कोई जो उनको बाँटा जाता है। खण्ड - खण्ड हो जाता उर , जब द�
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पूर्ण सत्य के पथ पर-जुर्म के खिलाफ उठ जाते है कई शख्श
जब भी बोलता हूँ मैं जुर्म के खिलाफ , उठ जाते है कई शख्श मेरे खिलाफ । देख रहे है जन अधरो पर हाथ धरे , मौन सभी बैठे है हाथो पर हाथ धरे
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झूठ-झूठी दुनिया झूठे लोगो को छोड़ा हो जाओ तुम भी सत्यनिष्ठ
मुझसे बच सका न कोई क्या मुझसा नहीं कोई चाहे जो कहते हो खुद को सतनिष्ठ पर बोले है कभी कही पर झूठ बुलताती ह
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लाठी-कभी तुम्हें हमेशा साथ लिए फिरते थे
कभी तुम्हें हमेशा साथ लिए फिरते थे। वो एक बास की थी लाठी जो हमेशा रहती थी साथ तुम तो इस युग के हो , तुम्हे तो आती होगी अ�
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मत आना इन मीठे वचनो में-वे बहकी बहकी बाते करते
लोगों के मृदु वचनो से तुम , घुल हदय मत बह जाना तुम । कोई नहीं भर सकता है , तेरे मन की झूठी तृप्ति निहित रहा �
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