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संदीप कुमार सिंह
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संदीप कुमार सिंह
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संदीप कुमार सिंह
@ sandeep-kumar-singh
, Bihar
I am a writer and social worker.Poems are most likeble for me.
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जीवन का कुछ लक्ष्य है-जिसमें भरे प्रकाश
(दोहा छंद) दो दिन के मेहमान सब,होते नहीं निराश। जीवन का कुछ लक्ष्य है,जिसमें भरे प्रकाश।। दो दिन के मेहमान है,जीवन का यह डोर। हरदम रखि�
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खूब जिन्दगी है मिली-इसका रखना मान
दोहा छंद) खूब जिन्दगी है मिली,बनें भव्य इंसान। इसका रखना मान है,दो दिन के मेहमान।। दो दिन के मेहमान सब,होते नहीं निराश। जीवन का कुछ लक
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करिए कभी गुमान मत-दो दिन के मेहमान
(दोहा छंद) करिए कभी गुमान मत, दो दिन के मेहमान। जीवन में जब शान हो,करते याद जहान।। खूब जिन्दगी है मिली,बनें भव्य इंसान। इसका रखना मान ह�
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आमद बढ़िया है हुई-सभी हुए गुलजार
(दोहा छंद) आमद बढ़िया है हुई, सभी हुए गुलजार। बदले बदले लग रहे,अपना ही परिवार।। बदले बदले लग रहे,अल्हड़ सी यह रात। तारे भी आकाश में,करत�
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हृदय हुआ है बाज-फिर भी दिल को चैन है
(दोहा छंद) बदले बदले लग रहे,वातावरण मिजाज। फिर भी दिल को चैन है,हृदय हुआ है बाज।। बदले बदले लग रहे,रंग भरी यह शाम। रौनक है बाजार में,जगह
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बदले बदले लग रहे-वातावरण मिजाज
(दोहा छंद) बदले बदले लग रहे,मौसम क्यों है आज। गरमी में कर के मजे,सबको है नव नाज।। बदले बदले लग रहे,वातावरण मिजाज। फिर भी दिल को चैन है,ह�
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अति का अंत करीब है-बड़ा द्रव्य संतोष
(दोहा छंद) अति का अंत करीब है,उत्तम मध्यम मार्ग। सदा रहे जो मध्य में,प्राण संगीत गार्ग।। अति का अंत करीब है,बड़ा द्रव्य संतोष। जिससे प
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सदा सत्य की जीत है-होगा तब कल्याण
(दोहा छंद ) सदा सत्य की जीत है, होगा तब कल्याण। अति का अंत करीब है,रावण बना प्रमाण।। अति का अंत करीब है,वर्जित यह सर्वत्र। हद में रहना ह�
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रहना सीमा में सदा-लगिए तब अभिजात
(दोहा छंद) अति का अंत करीब है,याद रखें यह बात। रहना सीमा में सदा,लगिए तब अभिजात।। अति का अंत करीब है,रावण बना प्रमाण। सदा सत्य की जीत है
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आया बचपन याद-खुशी से मैं तब झूमा
(रोला छंद) आया बचपन याद,खुशी से मैं तब झूमा। एक एक कर याद,सभी ने मुझको चूमा।। उस दिन के स्कूल,जहां करता था मस्ती। बच्चों से अनुराग,और था �
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