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संदीप कुमार सिंह
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संदीप कुमार सिंह
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संदीप कुमार सिंह
@ sandeep-kumar-singh
, Bihar
I am a writer and social worker.Poems are most likeble for me.
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जीवन एक चक्र समान ही है
जीवन एक चक्र समान ही है, सतत यह प्रक्रिया जारी रहता है। जन्म_मृत्यु का का खेल, निरन्तर जारी रहता है। यहां सब एक _दूसरे पर आश्रित हैं, �
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असली साथी वही हैं-सुख दुख में वह साथ हो
सच्चे साथी आपके, देते हरदम साथ। खुशियों को बांटें सदा, रहे मजबूत हाथ।। सच्चे साथी आपके, खुशियों का दे जाम। सुख दुख में वह साथ हो,आते रह
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जीवन के मूल आधार तो परिवार ही हैं
जीवन के मूल आधार तो परिवार ही हैं दुनिया का दर्शन तो परिवार ही दिलाते हैं। परिवार से ही समाज हैं, समाज से ही देश हैं। ज्ञान की प्रथम �
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प्रदूषण एक गम्भीर समस्या
प्रदूषण ही प्रदूषण बढ़ रहा है, जिन्दगी खतरे में अब पड़ गई है। प्रकृति के साथ हो रहें खेलवाड़ है, भौतिक सुख के चक्कर में पड़े सभी हैं।
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झूठ मत बोल- मैं सब समझता हूं
झूठ मत बोल मुझे मैं सब समझता हूं, तेरे हरेक चाल की खबर मैं रखता हूं। खुद से खुद के लिए गड्ढा मत खोद, वरना निकलना ही मुश्किल हो जायेगा। �
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नजर ने नजर से मुलाकात करी
आज सुबह जब मैं नींद से जगा और सामने देखा, प्रभात की खुशबू से वातावरण सुरभित था। बड़ा मन ही मन आनंद का अहसास हो रहा था, और लग रहा था की आज �
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प्यार व है जो नफरत को मिटाता है
कच्ची कली कचनार की तोड़ी नहीं जाती, राहों में किसी की सोहबत छोड़ी नहीं जाती। हुस्न के लिए कभी भी पीछे मत हटना, और अधिकार से भी पीछे मत �
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प्यार की किरण-जगमगा रही है
प्यार की किरण जगमगा रही है, जिसके साए में सारा जग झिलमिला रहा है। बढ़ती हुई स्वार्थ भावना पर, प्यार की किरण ही रोक लगाएगी। भटके हुए त�
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जिसका जितना हो आँचल-सौगात भी उसको उतनी ही मिले
जिसका जितना हो आँचल यहां पर, सौगात भी उसको उतनी ही मिले। जीवन में फूल खिलाने का प्रयास करें, कभी_कभी कांटे भी फूल बन जाते हैं। जीवन एक
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झुलस रहा है आदमी-महँगाई की आग
झुलस रहा है आदमी, छलियों का है राज। वादा झटपट तोड़ते, समझे खुद को बाज।। झुलस रहा है आदमी,मिलता है प्रतिघात। मन जाता है टूट तब,करते सभ्य
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