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ग़ज़ल
कदर कर लो हमारी
कर लो कदर हमारी कल बिछड़ गए तो दोष ना देना हमारी ज़ुल्म जितना सहना था सह लिया अब क्या करे बर्दाश् नहीं होता ए बेरुखी तुम्हारी गले स�
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अच्छा लगा
नज़रों से देखा उनके तो नजराना अच्छा लगा दिलाएंगी चांद वो बहाना अच्छा लगा यकीन मानिए जब जब हंसी मां मेरी मुझे जमाना अच्छा लगा
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इश्क में कितना दर्द होता है सनम
तुझसे जुदा होकर जाना इश्क में कितना दर्द होता है सनम तेरी मौजूदगी एहसास ना दिलाया मुझे भी इश्क द रोग हो सकता है सनम हंसते थें हम उनल�
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विरह वेदना
शब्द चुभने से लगे जब वो दूर हुए हम उन्हें मनाने में यू थक के चूर हुए ।। उसकी आशिकी में खुद को इस तरह डुबो दिया कि एक अर्सा बीत गया हमे�
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फिर वो याद आया है
आज फिर वो याद आया है जिसे कभी दिल से उतार दिया था आज ना जाने क्यों फिर वो याद आया है जो गुजारे थें हमने लम्हें और पल कभी एक साथ आज फिर व�
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जिस दिन से जुदा वो हमसे हुए
जिस दिन से जुदा वो हमसे हुए हमने भी उसके बिना जीना सीख लिया दिन ना गुजरते थें उसके बिना अब साल गुजराना सीख लिया तरस जाती थी मेरी आंख
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अक्सर क्यों दिल टूटता है
अक्सर मोहब्बत में क्यों दिल टूटता है जिससे बेहद प्रेम होता है वही दिल का सौ टुकड़ा करता है कल तक जो हमसे कहता था तेरे बिना ना जी सकूं�
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दिल की बात
तुम्हें भुलाने के चक्कर में हम खुद को भूले बैठे हैं । कहते फिरते हैं सबसे अब याद तेरी आती नहीं भूल चुके हैं! उसको ! अब दिल में कोई रहता
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मौका तो दो
जिंदगी मुझे तुमसे शिकायत बहुत है ! हर मोड़ पर छला है !तुमने मुझे! वह तो एक मै थी ! जो संभल गई चाहते ना मिली, ख्वाहिश न मिली, जिंदगी के इस मो
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सुकून कहां ढूंढू मैं
खुशी अपनी चेहरे की कहां ढूंढू मैं जो कहीं खी सी गई है सुकून अपने दिल का कहां ढूंढू मैं इधर भी नहीं है उधर भी नहीं है कदम जहां बढ़ रही ह�
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मनुष्यता ही धर्म
राख की कई परतों नीचे तक देखा पर अफसोस वह गुरुर, रूतवा और वह पद कहीं नज़र नही आया जो मनुष्य सारी उम्र ओढ़ के रहता है ।
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गजल
भरी भीड़ की इस जहां में जब से तुमको देखा है मेरी तो दुनिया तुझ में है सिमटी और क्या ही देखना है।
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