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कविताएँ
मध्यम और गरीब अब-हैं अति अति लाचार दिन दिन बढ़ता जा रहा महँगाई की मार
(दोहा छंद) मध्यम और गरीब अब, हैं अति अति लाचार। दिन दिन बढ़ता जा रहा,महँगाई की मार।। दिन दिन बढ़ता जा रहा,नशा युवा में आज। बेकारी से त्�
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नर नारी खाए दवा-सुख का मिले न भोग दिन दिन बढ़ता जा रहा भीषण मय अब रोग
(दोहा छंद) नर नारी खाए दवा,सुख का मिले न भोग। दिन दिन बढ़ता जा रहा,भीषण मय अब रोग।। दिन दिन बढ़ता जा रहा,महँगाई की मार। मध्यम और गरीब अब
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दिन दिन बढ़ता जा रहा-लोगों में अब लोभ लेना चाहे पर माल को जो है मनु पर चोभ
(दोहा छंद) दिन दिन बढ़ता जा रहा, लोगों में अब लोभ। लेना चाहे पर माल को,जो है मनु पर चोभ।। दिन दिन बढ़ता जा रहा,दुनियां में अपराध। जैसे ज�
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मौका रहे तलाश में-दुर्जन हैं विष घोल पानी पानी हो रहा मानवता का मोल
(दोहा छंद) मौका रहे तलाश में,दुर्जन हैं विष घोल। पानी पानी हो रहा,मानवता का मोल।। पानी पानी हो रहा,रहे निर्लोभ शांत। लोभी को बरसात मे
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अच्छा तथा खराब भी-खुशियों में कचनार पानी पानी हो रहा शहर गांव सब यार
(दोहा छंद) अच्छा तथा खराब भी, खुशियों में कचनार। पानी पानी हो रहा,शहर गांव सब यार।। पानी पानी हो रहा,मानवता का मोल। मौका रहे तलाश में,�
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अपना तुम्हें हम बना ना सके-हाथों को स्याही ने रंग सा दिया
तुम कही बुला न सके हम कहीं आ ना सके भावनाओं से भरी भीड़ थी जिसको स्वयं से मिटा ना सके। कदम लेखनी बनकर चलते गए आशा और इच्छा पनपते गये। �
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पानी पानी हो रहा- मौसम है बरसात सावन भी अब जोर में हुई सुहानी रात
(दोहा छंद) पानी पानी हो रहा, मौसम है बरसात। सावन भी अब जोर में, हुई सुहानी रात।। पानी पानी हो रहा,भले लोग जो आज। निर्लज खाया लाज को,करता
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जब से तुमको देखा-जैसे हो जीवन रेखा
जब से तुमको देखा जैसे हो जीवन रेखा कितने और भुलावे लेकर पहुंच गए हैं शशिरेखा। करुण कर्ण कि मूक परीक्षा देने से क्या होगा मेरे तुममें
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प्रेम रंग में लीन हैं-खुशियाँ लिए हजार सारी सीमा तोड़कर पर्वत के उस पार
(दोहा छंद) प्रेम रंग में लीन हैं,खुशियाँ लिए हजार। सारी सीमा तोड़कर, पर्वत के उस पार।। सारी सीमा तोड़कर,किया सरल व्यापार। जो था पूंजी
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खुद पे हो विश्वास जब-जीने में तब रंग सारी सीमा तोड़कर जीत यहां सब जंग
(दोहा छंद) खुद पे हो विश्वास जब,जीने में तब रंग। सारी सीमा तोड़कर, जीत यहां सब जंग।। सारी सीमा तोड़कर,पर्वत के उस पार। प्रेम रंग में ली
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सारी सीमा तोड़कर-खुद पर है विश्वाश
(दोहा छंद) सारी सीमा तोड़कर, खुद पर है विश्वाश। हरदम जीवन जंग है,होने मत दूं नाश।। सारी सीमा तोड़कर,करना है नव काम। जिसमें भला समाज का,
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नई सोच-उगता सूरज नई सोच तो छिपता सूरज निराशा
नई सोच उगता सूरज नई सोच तो छिपता सूरज निराशा घाट घाट जो भाषा बदले घाट घाट नहीं सोच मन कभी भागा इधर मन कभी भागा उधर नई सोच के इस चक्कर �
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