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कविताएँ
बचपन
कहाँ गया मेरा बचपन आज भी उसे मैं खोजता हूँ। बस,उसे याद करके मायूस हो जाता हूँ। कितना खुश था,जब बचपन मे था। आज जब युवा अवस्था हूँ तब जि�
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बूढ़ा वृक्ष....
कई वर्षों से देखा चला आ रहा हूँ उस पुराने बूढ़े वृक्ष को। कभी उस पर भी हरियाली थी। बैठे रहते थे उस पर बंदरों का समूह, गाते थे उसपर पंछियो
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पिता
पिता मान है, पिता सम्मान है। पिता ही मेरे अभिमान है। मैं जिनकी पूजा करूँ वह पिता देवतुल्य समान है। पिता धर्म है, पिता ज्ञान है। जिनकी
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स्त्री
स्त्री.... कितना छोटा शब्द है यह मगर,स्त्री होना सहज नहीं है। स्त्री बनकर जीना सहज नहीं है। स्त्री... कितना छोटा शब्द है यह। स्त्री तो ह�
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हाँ, मैं लड़की हूँ।
हाँ, मैं लड़की हूँ। निडर और प्रतिभावान हूँ। मुझे भी अपनी सपनों को पूरा करने का अधिकार है। समाज की अस्मिता हूँ। हाँ, मैं लड़की हूँ। मुझे
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माँ की महिमा
माँ के बारे में क्या लिखूँ? कैसे बखान करूँ, या कैसे माँ शब्द को परिभाषित करूँ? ईश्वर भी जिनकी चरणों में शीश नवाते हैं। जिनकी सेवा भी प�
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कविता
कविता.….। क्या है कविता? कवियों की मनोभाव है कविता या,मनोरंजन की साधन है कविता। क्या है कविता? पर,मेरे विचार से या कवियों की हिसाब स�
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जललीला
शीतल हवाएं शीतकारी यौवन बिखेरती जग में, ले रज कड़ों को हुई उड़ती प्रकृति से खेलती जग में। पेड़ पत्तियों को सदा झूला झुलाती हुई, चलती घटो�
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शेर और सवा शेर
शेर को भी, मिलता है सवा शेर। ख़लक़ नहीं खाली, शूरवीरों से। पीरों का पीर, बड़ा पचपीरों से। फ़क़ीरों की शफ़क़, फीकी नहीं अमीरों से। ग्र�
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किसान और खेत
जेठ रो महिणो लागियो कृषाणा डीकरा उभा खेत सुधारै है, पसीनै सूं लथपथ होयोङा जवानी सफल बणावै है, देख तींतर भरणी बादळी ईंद्र पुकारै है , का
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मन की बात
ये धरती टिकी जवानों से हम जाने जाते नामो से। और कुछ भी नहीं जीवन में हम बढ़ते अपने कामों से।। ये सूरज का उजियारा है ये भारत देश हमारा ह
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आओ चलें मिलकर चलें
कविता -आओ चलें मिलकर चलें। कहां जा रहा है अकेला छोड़ अपनों का झमेला जिंदगी अनमोल मेला हम छोड़ इसको क्यों चले
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