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कविता = ( उदर कुंड ) उदर कुंड में क्यों धधकाई ! भूख की यह प्रचंड ज्वाला ! सब कुछ हुआ सुहा मेरा ! किस -‌ किस का दूं हवाला ! बस कश्मकश रोटी की ! read more >>
कविता = ( दरकार ) निष्काम सेवा से नहीं चलता परिवार ! पेट को रोटियों की है दरकार !! खाली ख़ज़ाना नहीं चलती सरकार ! भूखे पेट भजन कैसे होए मेर� read more >>
इस बड़े शहर की भीड़ तूँ ,मेरे अधूरे ख़यालों की रीढ़ तू कभी सूखे में गिरी बारिश तूँ , तों कभी ख़ाली हवेली की वारिश तू कभी पहाड़ों की ठंडी read more >>
समसामयिक व्यंग रचना...... # नशा मुक्ति अभियान ..... कहीं कार्यक्रम था नशा मुक्ति का इसे छोड़ने की , अचूक युक्ति का .....! मंच पर नेताजी , जनाब � read more >>
छोटा सा बचपन का सपना सपने में था फोजी बनना दौड लगाना खेलने जाता माँ बाप का मान बढाना माँ से कहता खूब खिलाना फिर मुझको है सीमा पर जाना � read more >>
जिन्दगी चलती है चलते रहो, वक्त के साथ थोड़ा बदलते रहो ... राह मुश्किल भी निकल जाएगी, ठोकरें खा के भी थोड़ा संभलते रहो... अंधेरा तो जुगनू स read more >>
शीर्षक (गर्मी का मौसम) मेरे अल्फ़ाज़ (सचिन कुमार सोनकर) उफ़ ये गर्मी हाय ये गर्मी। उफ़ ये कैसी गर्मी है, चारों तरफ ही आग है, ये सब गर्मी का ही read more >>
# सुप्रभात ..... यत्र - तत्र - सर्वत्र , व्याप्त यहां विज्ञान ...! तन , मन , प्राण , आत्मा , ये जीवन के चार आयाम ....! आओ जाने इसे हम , आखिर क्या है आत� read more >>
कविता- कलमकार मृत हुए जन दिल को जिंदा कर देता, लौकिक जीवन रंगमंच का जादूगर हूं। प्रबल निराशा में मैं आशा की किरण, प्रेरक और मार्गदर्श� read more >>
मानव कितना दीन हो गया बड़ा संवेदनहीन हो गया आगे बढ़ता जाता है मुड़कर नहीं देखता उसको जिस पर चढ़कर खेली आनंदो की होली। मानव कितना दी� read more >>
दर्द तो होता है! मगर दवा नहीं आती!! शिकवे हैं  बहुत उससे! मुझे शिकायतें नहीं आती!! तकलीफ है, रूह है, ये उसकी! कम्बख्त मेरी जान भी नही read more >>
तुम दीप में ज्योति बनके प्रज्वलित होना मैं रात में चांदनी बनके रोशनी बिखेरूंगी। 🌛🌜🌛🌜🌛🌜🌛🌜🌛 तुम धूप में छांव बनके राहत देना मैं भ� read more >>
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