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तेरे आँगन का गुलमोहर
तेरे आँगन का गुलमोहर कितना अच्छा लगता हे/ कहाँ से लिया तुमने इसको इसकी छाया को तो देखो मानो धरा में बदली का सूरज को ढकना सा इसके पत्
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ठेर जा मुसाफिर
ठेर जा मुसाफिर गर्मी बहुत हे/ थोड़ा विश्राम कर ले थोड़ा हवा से बातें करले मन को थोड़ा शांत कर ले ठेर जा मुसाफिर गर्मी बहुत हे/ दूर जाना �
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ज़िंदगी क्रिकेट
यह ज़िंदगी, एक क्रिकेट है। आदमी एक खिलाड़ी है। कितना ही अच्छा खेलो, हारता जो क़िस्मत आड़ी है। जीवन पिच् पर चलती, जाती समय की गाड़ी है।
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आत्महत्या
आई ऐसी विषम परिस्थितिय कर ही लिया एक किसान ने आत्महत्या पूरे जग का है पेट भरता घर घर में हैं चूल्हा जलवाता खुद का घर सुना होता आई ऐसी व
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क्या लिखू मैं
क्या लिखू मैं? हा मेरा पहला सवाल सब का दबाव मुझ पे उठाओ कलम लिखो क्या लिखू मैं? आज सोचा चलो उठा लो कलम फिर सोचा क्या लिखू मैं हर बार यह
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अंतरिक्ष
कविता-अंतरिक्ष आओ मन के अंतरिक्ष में शैर कर लें। चांद का शीतल प्रभा चित् में पिरोए आज हम शांत कर चित् चेतना ज�
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दलाली का स्तर कितना ऊंचा है
तुम देते हो गाली तुर्कों को लेकिन जिक्र तक नही करते अंग्रेजों का,अपनी किताबों मे और तो और तुम्हारी वाट्सएप युनिवर्सिटी मे मुगलों की
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बदलते रिस्तें
कविता-बदलते रिस्तें अब तो रिस्तों पर भरोसा न रहा रिश्तों का रंग अपनों के संग होते हैं गाढ़े सदा के लिए न होते दुरंग न होंगे कभी भी न
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शबनम -मोती
यौवन युक्त विभावरी, श्रृंगार करे रजनी रानी। जूड़ा खोले, केश सुखाए, छिड़क गया अमृतपानी। अल्हड़ बूंद नादान- सी, धरती पहुंच इतराती। चमचम
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मैं खुद से दूर हो गया
मैं खुद से दूर हो गया हूं, कहा हु में लोगो से ये पूछने को मजबूर हो गया हूं। हंसती खेलती जिंदगानी में पता नहीं कब जिम्मेदारी का बोझ आ गया�
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बेचैन दिल
बेचैन दिल ये मेरा जालिम, कुछ सुनने का अब नाम ना ले । बस दोष मढ़े सर औरो के, खुदपर कोई इल्ज़ाम ना ले।। चाहत तो थी की मैं बनु नेता, पर च�
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शीर्षक (बारिश का मौसम)
शीर्षक (बारिश का मौसम) मेरे अल्फ़ाज़ (सचिन कुमार सोनकर) चेहरे पर खुशियाँ आती है काली घटा जब बदल पर छाती है। झूम के पवन फिर गाती है , पेड़ो प�
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