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Santosh kumar koli ' अकेला'

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My Articles

बाहर से जितने, मज़बूत दिखते हैं। अंदर से उतने ही, क़ायल, कमज़ोर होते हैं। एक पैसा नहीं जेब, पैसे -पैसे तक तरसते हैं। संतान की हर ख्वाहि� read more >>
सामने गुस्से से, डांटती, डपटती है। सोए हुए का धीरे से आ, माथा चूमती है। सामने निठल्ला, निकम्मा, कामचोर कहती है। बाहर मेरी बड़ाई करते, क read more >>
मेरे ठीक सामने एक परिवार रहता है, इस परिवार में अनिल, उसकी पत्नी निशा, माता-पिता और एक मात्र पुत्र जो अभी 5-6 साल का ही है प्यार से सब उसे पि� read more >>
एक श्येन हो सयाना, उड़ा पारापार। इठलाता, बल खाता, देखा विक्ष पसार। चिड़ी बावली, खेत खोखला, उपजे उपज़ हज़ार । सरसर- सरसर पर फैलाए, चीरे � read more >>
अध सच है, आधा खाली है गिलास। पूरा सच है, आधा भरा, कहता कोई काश। मिलता है हार का हार, हार जाता हूं करते प्रयास। पूरा सच है, प्रयास में, कमी read more >>
मेरे पड़ोस में एक परिवार रहता है। रमेश जो कि परिवार के मुखिया हैं, उनका खुद का व्यवसाय है। उनका नाम उस गांव के सभ्य परिवारों की अलिखित स read more >>
ऋतु मिज़ाज घटी सरदी, वर्षा तप्ति है आज औलाद पीर हारता बादशाह हारे फ़क़ीर ख़ैरात नहीं गौ वंश अधिकार दो सरकार read more >>
बिन परदा सारी दुनिया, है नंगी की नंगी। परदे के सब कायल, बहुरंगी, चाहे सत्संगी। परदे का क़ायम मुकाम नहीं, है सिर्फ़ लांघ, लंगी। परदे का � read more >>
बेटे को समझ नहीं आता, भाव बाप होने का। समझता जब बनता बाप, क्या डर है फिर खोने का? बहू समझ नहीं पाती, भाव सास होने का। खुद बनती सास तब समझत read more >>
ऊबड़-खाबड़ या समतल, चमचमाती चाहे रज ओढ़ी। मिट्टी, गिट्टी की बनी, चाहे सीमेंट रोड़ी। चले गंत्रिका मोटर गाड़ी, चाहे सीर की जोड़ी। चले र� read more >>
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