MUSARRAT ALI 16 Nov 2025 ग़ज़ल समाजिक Khamosh_Alfaz 10141 1 5 Hindi :: हिंदी
ना बुलाना ख़ुदा हमे जन्नत मे
ज़िंदगी के कुछ अरमान बाकी है
जरा सांस तो लेने दो फरिश्तों
हमारी अभी जान बाकी है ।
देखता हूँ शहर में हैं कौन कौन बादशाह
किसी का कर्ज़ तो किसी का एहसान बाकी है ।
दो वक्त कि मोहलत मिले सुना दू अपनी दास्तां
सासें रुक गयी पर कहने को जुबान बाकी है ।
खुलके हंसलु फिजां मे मिले जो कोई हमसफर
यूँ उम्र भर को रोने का अंजाम बाकी है ।
छोड़ दुनिया को अगर मैं सहरा में चला जाउं
तब जनाज़े को मेरा इंतजार बाकी है ।
मैं खुद से रो ना पाउं मुझको नहीं मलाल
सारे अस्क बहाने को मेरा खानदान बाकी है ।
...... By M.Ali
5 months ago