अशोक दीप 17 Jun 2024 ग़ज़ल समाजिक 33375 0 Hindi :: हिंदी
गीतिका चिथड़े लिपटी हर इक मूरत, अंतर्मन तक खंडित है । बैठा है जो रजत सिंहासन, बस वह महिमा मंडित है । जाने कितने मेघ लिये वह, बरसे है मन मरुथल में, और जमाना कहता उससे, यार आजकल नंदित है । बता मुझे वह क्यों ना होता, झूठ- राज का दरबारी, जिसने पकड़ा हाथ सत्य का, देख वही नर दंडित है । कहने वाले कह देते हैं, क्या खाक किया है तुमने, वे क्या जाने मात- पिता की, रूह रक्त से रंजित है । कुछ चुग्गा दे कुछ पानी रख, है अर्थ यही जीवन का, वरना है मिट्टी की ढेरी, यह जो दौलत संचित है । अशोक दीप जयपुर