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वक़्त की नज़र

मोती लाल साहु 27 Sep 2025 ग़ज़ल अन्य #ज़िंदगी ​#नश्वरता ​#हयात ​#वक़्त ​#आख़िरत​#फ़ानी ​#मोह ​#दौलत ​#ग़ज़ल ​#motighazal 19609 1 5 Hindi :: हिंदी

भूल मेरी कि मैं यहांँ रहूंँगा बरकरार,
ना कोई जीव और जगत रहेगी बरकरार।

गुरुर-ए-दौलत-ओ-हिकमत किस पे कीजे,
नज़र है वक्त की, सब कुछ रहेगा नादार।

ख़याल-ए-ज़िंदगी था, कि सदा महफ़िल सजेग़ी,
हयात-ए-फ़ानी का पल भर का है ये सिंगार।

सोचा था, बारात सजेगी मैं दूल्हा बनूंँगा,
पर आख़िरत की सजेगी, ये डोली सबकी यार।

ये आरज़ू-ए-जहांँ सबको मोती ने बताई,
की चलना है हमें सबको, ये कैसा है क़रार?
-मोती

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मोती लाल साहु
मोती लाल साहु यह ग़ज़ल जीवन की क्षणभंगुरता, दुनियावी चीज़ों के मिथ्या अहंकार, और मृत्यु की अटल सच्चाई के गहरे दार्शनिक विषयों को दर्शाती है। ​ग़ज़ल का भावार्थ ​ग़ज़ल का हर शेर जीवन और मृत्यु के सत्य को उजागर करता है, और इंसान को उसके अहंकार तथा सांसारिक लगाव से ऊपर उठने का संदेश देता है: ​1. क्षणभंगुरता का बोध ​भूल मेरी कि मैं यहांँ रहूंँगा बरकरार, ना कोई जीव और जगत रहेगी बरकरार। ​भाव: यह कि यह मेरी भूल (गलतफहमी) है कि मैं इस दुनिया में हमेशा बरकरार (स्थायी/कायम) रहूँगा। सत्य यह है कि न तो कोई जीव (प्राणी) और न ही यह पूरा जगत (दुनिया) सदा के लिए कायम रहेगा। सब कुछ नश्वर है। ​2. अहंकार की व्यर्थता ​गुरुर-ए-दौलत-ओ-हिकमत किस पे कीजे, नज़र है वक्त की, सब कुछ रहेगा नादार। ​भाव: यह कि दौलत (धन-संपत्ति) और हिकमत (बुद्धिमानी/ज्ञान) का गुरुर (अहंकार) किस पर किया जाए? क्योंकि वक्त (समय) की नज़र (दृष्टि) जब पड़ेगी, तो सब कुछ नादार (ग़रीब/कुछ भी नहीं) हो जाएगा, यानी सब कुछ मिट जाएगा। संसार की शक्ति और संपत्ति पर घमंड करना व्यर्थ है। ​3. जीवन एक अस्थायी श्रृंगार ​ख़याल-ए-ज़िंदगी था, कि सदा महफ़िल सजेग़ी, हयात-ए-फ़ानी का पल भर का है ये सिंगार। ​भाव: यह कि जीवन एक ऐसी महफ़िल (सभा/उत्सव) है जो हमेशा सजी रहेगी। लेकिन फिर वह इस भ्रम को तोड़ते हुए कहता है कि यह हयात-ए-फ़ानी (नश्वर जीवन) तो केवल पल भर का सिंगार (सजावट) है। जीवन की चमक-दमक बस थोड़ी देर की है, अंत में सब फीका पड़ जाएगा। ​4. मृत्यु की अटल सच्चाई ​सोचा था, बारात सजेगी मैं दूल्हा बनूंँगा, पर आख़िरत की सजेगी, ये डोली सबकी यार। ​भाव: यह शेर जीवन के सपनों और अंतिम सत्य की तुलना करता है। हर इंसान सपना देखता है कि उसकी बारात सजेगी और वह दूल्हा बनेगा, जो जीवन के सुखद आरंभ का प्रतीक है। लेकिन सत्य यह है कि अंत में आख़िरत (परलोक/मृत्यु) की डोली सजेगी। यह डोली सबकी है, यानी हर किसी को एक दिन मृत्यु के लिए तैयार होना है—यही सबका अंतिम गंतव्य है। ​5. जीवन का अंतिम प्रश्न ये आरज़ू-ए-जहांँ सबको की चलना है, हम सबको, ये कैसा है क़रार? ये कैसा है क़रार? ये कैसा है क़रार? -मोती ​भाव: आख़िरी शेर प्रस्तुत निष्कर्ष यह कि आरज़ू-ए-जहांँ (संसार की इच्छा/कामना) में जीते हुए भी, सत्य यह कि हम सबको चलना है (मरना है/आगे बढ़ना है)। वह अंत का हमें पता है कि अंत में मरना है, तो यह संसार के प्रति इतना गहरा क़रार (बंधन/सहमति/लगाव) क्यों है? ​निष्कर्ष ​यह ग़ज़ल इंसान को सांसारिक मोह-माया और अहंकार त्यागकर जीवन के परम सत्य (मृत्यु और नश्वरता) को स्वीकार करने की प्रेरणा देती है। यह हमें याद दिलाती है कि जीवन एक यात्रा है और अंतिम सत्य यही है कि सब कुछ अस्थाई है, इसलिए घमंड या लगाव में न पड़कर सच्चाई को अपनाना चाहिए। -मोती

9 months ago

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