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अंटार्कटिका का पेंगुइन

Radheshyam Joshi 27 Jan 2026 गीत अन्य 8322 0 Hindi :: हिंदी

अंटार्कटिका का वो अकेला पेंगुइन।
जो सोचता भी है, समझता भी है।
और फिर मुड़ जाता है एक लंबी,
अथाह बर्फ की यात्रा पर__
अपने ही भीतर के पेंगुइन से मिलने।
शायद मृत्यु मिले, शायद मंज़िल।
कुछ ऐसा जिसकी तलाश सिर्फ़ उसे है।
हज़ारों अनसुलझे, अनसुने सवाल
अधूरे छोड़कर वह अलविदा हो गया।
मगर जाते-जाते वह रास्ता दिखा गया।
भीड़ क्या है और भीड़ से हटकर क्या।
साथ रहना शायद सुरक्षित है,
पर सपने और मंज़िलें
अक्सर अकेले ही गढ़नी पड़ती हैं।
वह वर्षों तक स्मृति में जीवित रहेगा।
चिरचिह्न सा, बर्फीले पहाड़ों पर।
जो हारा या मरा, पर चढ़ता रहा।
उसे देखना था, पाना था, समझना था।
जो कोई नहीं कर पाया,
शायद वह भी नहीं__।
पर उसने किया,
जो उसे करना था।
तू अमर है।
तू समर्थ है।
हे कर्मवीर!!!
- राधेश्याम जोशी ‘कोहिणा’

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