महेश्वर उनियाल उत्तराखंडी 21 Jun 2026 कहानियाँ समाजिक 3736 0 Hindi :: हिंदी
दूर होते अपनों से मित्रों। बात बदलते हुए नये जमाने के रंगों की है, जहां पर इन्सानी रंगांे को भी बदलता हुआ देखा जा सकता है, वैसे तो समय के साथ-साथ बदलना प्रकृति का नियम भी है, किन्तु इतना बदलना कि खुद को खुद से ही अलग करना पड़े, यह तो कुछ अजीब बात है। पुराने समय में गांव-घरों में लोगों को एक साथ मिलकर रहना, चौपाल लगाकर बैठना, और साथ में बैठकर बातें करना व ठहाके लगाना आदि के बारे में तो हम सब ने सुना ही है, तथा रिश्तों को कई पीढ़ियों तक संजोए रखना और अपने दादाजी और पिताजी को यह कहते हुए सुनना कि उन्हें अपने दादा के दादाजी का नाम भी याद है, किन्तु आज इस प्रथा का लोप होता नजर आ रहा है। अब आप सोच रहे हांेगे कि मै ऐसा क्यों कह रहा हूं, तो आप बिल्कुल ठीक सोच रहे है, क्योंकि मै आप को अपने साथ हुई एक ऐसी घटना के बारे में बताने जा रहा हूॅ, कि जो इस बात को साबित करती है, कि हम इतने पास होते हुए भी एक दूसरे से मीलों दूर है। दोस्तों जब एक दिन, मै और मेरा दोस्त मोटर साईकिल से कहीं जा रहे थे तो मेरा दोस्त गाड़ी चला रहा था और मै उसकी पीठ के ठीक पीछे या यूॅ कहूं कि दो सीट वाली मोटर साईकिल की पिछली सीट पर दोस्त से चिपककर बैठा हुआ था, और दो हेलमेट पहनने की अनिवार्यता और चालान की बढ़ी हुई राशि के डर से हम दोनो हेलमेट पहने हुए थे, जिससे टाईम पास के लिए हम दोनों आपस में बात करते तो, उसकी बात मुझे ना सुनाई देती और ना ही मेरी बात उसको। अब हम दोनों ने अपने मोबाइल फोन से ईयर फोन लगाकर गाने सुनना शुरू किया, जिससे वो अपनी धुन में और मै अपनी धुन में, अब हम दोनों सिर्फ पुतलों की तरह बैठे हुए थे जो केवल एक दूसरे से लगे थे, किन्तु आपस में कोई सम्पर्क नहीं कर सकते थे, तभी मेरे मोबाईल की घण्टी बजी...ट्रिंग..ट्रिंग..... और मै चौंक गया, सोचा कि शायद किसी रिश्तेदार की कॉल आ रही होगी, सर्दी का मौसम होने के कारण पहले तो जैकेट की अन्दर वाली जेब से मोबाईल को बड़ी मुश्किल से बाहर निकाला, और जब देखा तो देखते ही रह गया, क्योंकि यह कॉल किसी रिश्तेदार की नहीं बल्कि मेरे साथ बाईक चला रहे मेरे दोस्त की थी, जो मुझसे सिर्फ इतना पूछना चाहता था कि, क्या उतर के चाय पी लें। किन्तु ये देख कर मै हैरान तो बहुत हुआ लेकिन आश्चर्यचकित नही हुआ क्योंकि मेरी समझ में दो बातें ठीक उसी समय दखल देने लगी, कि समय बदल रहा है, जिसमें एक तो मेरे दोस्त की कॉल फ्री होना था, जिसका फायदा वो उठा रहा था, तथा दूसरा यदि मैने चाय पीने से मना किया तो बेफिज़ूल समय को बर्वाद होने से बचाना, और हुआ भी यही कि मैने चाय पीने से मना कर दिया और मेरे दोस्त ने बिना रूके बाइक को चलाना जारी रखा और हम आगे बढ़ते रहे। चलते-चलते मै ये बात सोचने लगा, कि आज इन्सान ने कितनी तरक्की कर ली है, कि हम एक साथ होते हुए भी साथ होने का एहसास नहीं करते और अपनो से दिनों दिन दूर होते जा रहे है। लेखक- महेश्वर उनियाल उत्तराखण्डी