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कामयाबी रुकती नहीं-इसलिए मैं कह सकता हूँ कामयाबी रुकती नहीं

Mohd meraj ansari 20 Sep 2023 कहानियाँ समाजिक मेहनत, समझ, कामयाबी, कामयाब, मजदूरी, शिक्षा, लक्ष्य, बचपन, जीवन का आधार 26630 0 Hindi :: हिंदी

रामचरितमानस में तुलसीदास ने कहा है - होइहे सोई जो राम रचि राखा. को करि तर्क बढ़ावै साखा.
भावार्थ ये है कि जो कुछ राम ने रच रखा है, वही होगा. तर्क करके कौन शाखा (विस्तार) बढ़ाए.
वहीं दूसरी ओर श्रीमद्भागवत गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं - न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभु:.
न कर्म फल संयोग स्व भावस्तु प्रवर्तते.
भावार्थ ये है कि कर्म करने वाला, कर्म और कर्म फल ईश्वर नहीं बनाता अपितु इनमें हमारा जीवन हमारे स्वभाव से ही प्रवृत्त होता है.
ये पंक्तियाँ मैंने किसी हिंदी गुरु से नहीं बल्कि एक ऑटो चलाने वाले के मुंह से सुना था. मै सोच में पड़ गया कि इतना जानकार आदमी ऑटो क्यूँ चला रहा है. मुझसे रहा नहीं गया तो मैंने उस ऑटो वाले से उसके बारे में जानने की कोशिश की. दृश्य ऐसा था कि ईद का दिन था और मैं अपने दोस्त के साथ घूमने जा रहा था. ऑटो रोकने के लिए हम ने हाथ दिखाया तो सामने एक ऑटो रिक्शा आ कर रुका. मेरा दोस्त आफताब फोन पर बात कर रहा था तो उसे देखते ही ऑटो वाला उसे देखते ही बोला - इसे तो लवेरिया हो गया है. सुन कर हम दोनों सोच में पड़ गए कि ये क्या होता है? ऑटो में बैठ कर हम ने अपनी मंजिल बतायी फिर उनसे पूछा कि लवेरिया क्या होता है भाई? उन्होनें बताया कि जो किसी के प्यार में पागल हो जाता है उसे ये लाइलाज बीमारी हो जाती है. हमें ये सुन कर बहुत हंसी आई क्यूंकि ऐसा तो कुछ था नहीं. लेकिन उनकी बातें हमें पसंद आई. इतना तो समझ आ गया था कि ये आदमी हंसमुख और बातूनी है. बस हम उनसे बात करने लगे. आफताब ने पूछा आप कहां के रहने वाले हो तो ऑटो वाले बोले ग्वालियर का. यहां कब से हो तो जवाब मिला 10 साल की उम्र से. मुझे उनके बारे में जानकर कुछ दिलचस्पी हुई. मैंने उनके बारे में थोड़ा और पूछा तो उन्होने अपनी पूरी कहानी सुनाई जो मै अपनी जुबानी आप सभी को बताता हूँ.
उनका नाम है शंकर साहु. मध्यप्रदेश प्रांत के ग्वालियर जिले के एक छोटे से गाँव सनाई के रहने वाले. बचपन से वो बहुत समझदार और जज्बाती थे. छोटी - छोटी बातें दिल पर ले लेते थे. कुछ ऐसा ही हुआ उनके बचपन में जिसने उनकी ज़िन्दगी बदल दी.
10 साल की उम्र में उनकी गाय किसी दूसरे के खेत में घुस गयी और फसल को नुकसान पहुंचा दिया. खेत वाला आया और शंकर के पिता से झगड़ा करने लगा. शंकर के पिता बोले कि आपका जो भी नुकसान हुआ है मैं भर दूँगा. लेकिन खेत का मालिक नहीं माना और शंकर के पिता को गालियाँ देने लगा. शंकर वहीं खड़ा था और सब कुछ देख रहा था. शंकर को बहुत गुस्सा आ रहा था लेकिन एक 10 साल का बच्चा कर भी क्या सकता था. जब बात हाथापाई पर आ गयी तो शंकर से सहन ना हुआ. अब पानी शंकर के सिर से ऊपर जा चुका था. शंकर ने गुस्से में एक पत्थर खेत में से उठाया और खेत के मालिक के सिर पर दे मारा. उसका सिर फूट गया और वो चकरा कर वहीं गिर गया. अब शंकर के पिता डर गए. वो शंकर को वहां से पीटते हुए घर लाए. खेत के मालिक को गाँव वाले अस्पताल ले गए. ठीक होकर उसने शंकर के पिता पर पुलिस में जानलेवा हमला करने के मामले में मुकदमा कर दिया. जिसकी वजह से उन्हें बहुत तकलीफ उठानी पड़ी. गुस्से में उन्होने शंकर से कह दिया कि तेरी जैसी औलाद होने से तो बेऔलाद बेहतर है. बस ये बात शंकर के दिल को लग गयी. उसे लगा कि मैंने अपने पिता के लिए उस आदमी को मारा फिर भी वो मुझसे ऐसी बात कह रहे हैं मतलब मेरे होने या ना होने से किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता तो मेरा यहाँ रहने का कोई फायदा नहीं. जब मैं सबसे दूर चला जाऊंगा तब उन्हें एहसास होगा कि मेरे ना होने से क्या फ़र्क़ पड़ता है. यह सोचकर शंकर ने घर से भागने का विचार बना लिया. उसके पड़ोस में एक चाचाजी रहते थे जो कि गुजरात में ऑटो रिक्शा चलाते थे. उस समय वो अपने घर आए हुए थे और एक - दो दिनों में वापस गुजरात जाने वाले थे. शंकर ने उनसे बात किया और उनके साथ जाने की तैयारी बना ली. 2 दिन बाद किसी को बताए बिना शंकर चाचाजी के साथ निकल गया और गुजरात पहुंचा. 10 साल का अकेला लड़का और रहने- खाने का कोई इंतज़ाम नहीं. सोचा कि जीविका के लिए क्या किया जा सकता है तो किसी ढाबे में बर्तन धोने का काम करने लगा और चाचाजी के साथ रहता. उसी से उसकी जीविका चलने लगी. उधर घरवालों ने खोजबीन चालू की लेकिन शंकर की कोई खबर उन्हें ना मिल सकी. शंकर ढाबे में बर्तन धोता और उससे जो भी आमदनी होती उसमे से थोड़े पैसे बचा लेता. फिर उसने स्कूल में अपना दाखिला अपने दम पर करवाया और काम के साथ - साथ पढ़ाई पर भी ध्यान दिया. 6 साल तक उसने बर्तन धोए फिर 16 की उम्र मे उसने चाचाजी से कहा कि मुझे भी ऑटो चलाना सिखा दो. चाचाजी मान गए और उसे ऑटो चलाना सिखाया और फिर एक भाड़े पर ऑटो का इंतज़ाम भी कर दिया. अब शंकर ऑटो चलाकर आमदनी करने लगा और पैसे बचाकर 8 साल में उसने खुद की 3 ऑटो ले ली और 1 को खुद चलाता और 2 को भाड़े पर दे दिया. 3 ऑटो से उसकी आमदनी काफी अच्छी होने लगी थी और उसे और भी आगे बढ़ने की चाहत थी. इन 8 सालों के दौरान शंकर के माता- पिता को पता चल चुका था कि शंकर कहाँ है और क्या कर रहा है तो मोह में वो उसे लेने के लिए 3 बार आए लेकिन शंकर ने उनकी एक बार ना सुनी और वापस नहीं गया. उसे अपनी मंजिल दिख रही थी कि वो क्या कर सकता है और कितनी ऊंचाई तक जा सकता है इस वजह से वो वापस नहीं लौटा. गाँव में फसाद कर के भागा था इसलिए भी वापस नहीं जाना चाहता था कि कहीं फिर से उसे गाँव में देखकर कोई लफड़ा ना हो.
वैसे जब मेरी मुलाकात शंकर से हुई तो मैं उस समय ऑटो रिक्शा चालक के ऊपर कोई कहानी लिखना चाहता था लेकिन किसी की भी कहानी मुझे जँच नहीं रही थी. लेकिन शंकर की बातें सुनकर मुझे उसकी पूरी कहानी जानने का मन हुआ और मैंने उसका इंटरव्यू ले लिया. एक 10 साल का बच्चा जिसने अपने दम पर मेहनत करके पढ़ाई भी किया और ऑटो चलाकर खुद को व्यवस्थित भी कर लिया. अगर वो अपने घर से ना भागता तो बेशक वो तब भी कामयाब हो सकता था क्यूंकि कामयाब होने का हुनर उसके अंदर था लेकिन घर रह कर वो थोड़ा बंधन में रहता और खुले विचारों के ना होने की वजह से उसे अपनी मंजिल खोजने में वक़्त लगता लेकिन फिर भी उसकी कामयाबी रुकती नहीं. क्यूंकि उसके अंदर जज़्बा था और हौसला था. जिसका इस्तेमाल कर के उसने खुद को कामयाब किया. उसने मुझसे बहुत- सी ज्ञान की बातें की थीं जिनका उल्लेख मैंने कहानी की शुरुआत में कर दिया है. शंकर दोनों बातों को ध्यान में रखता था कि कृष्ण भगवान ने कहा है कर्म करने से ही हमें फल की प्राप्ति होती है लेकिन तुलसीदास जी कहते हैं कि कुछ भी कर लो जितना भी हाथ - पैर चला लो, होगा वही जो श्रीराम ने हमारे भाग्य में लिख रखा है. भले ही शंकर दुविधा में रहता था लेकिन उसने बचपन में श्रीकृष्ण को प्राथमिकता दी और कर्म किया. कामयाब होने के बाद सब कुछ श्रीराम पर छोड़ दिया. तात्पर्य तो यही निकलता है कि कर्म करो फल की चिंता मत करो. फल तो श्रीराम ने निर्धारित कर ही रखा है. हो सकता है कि भाग्य में लिखा हो कि कर्म करने से ही मिलेगा. इसीलिए शंकर ने श्रीराम और श्रीकृष्ण दोनों का अनुसरण किया और कामयाबी उसे मिलने से रुक ना सकी. 
मैंने शंकर से कहा था कि मैं उसकी कहानी जरूर लिखूंगा तो उसने मुझसे बोला कि लिखना तो मुझे बताना जरूर. जिस दिन हम मिले उसके अगले दिन ही शंकर का जन्मदिन था मैंने फोन कर के उसे जन्मदिन की बधाई दी और उसी रात को यह कहानी लिखना शुरू किया और अब लिख कर पूरी कर चुका.
शंकर की कहानी से आपको क्या सीख मिली ये तो आप ही जानते हो लेकिन मुझे तो ये सिख मिली कि कोयला दबाव सह कर हीरा बन जाता है और पत्थर चोट खा कर मूर्ति बन जाती है. जिस बचपन में शंकर को खेलना-कूदना था उस उम्र में उसने संघर्ष किया और कामयाब हो गया. इसलिए मैं कह सकता हूँ कामयाबी रुकती नहीं.

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