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क्षमा का प्रार्थी

Mohd meraj ansari 20 Sep 2023 कहानियाँ समाजिक क्षमा का प्रार्थी, क्षमा, दान, धर्म, माफी, गलती, समय, गांव, शहर 28161 0 Hindi :: हिंदी

रूपेश हमेशा किसी असमंजस में रहता था. उसकी पत्नी सुलेखा उसकी असमंजस को समझ नहीं पाती थी. पूछने पर ना बताना रूपेश की एक बुरी आदत थी. सुलेखा सोचती थी कि मैं उनकी पत्नी हूँ आखिर मुझसे वजह छुपाने की क्या आवश्यकता है इन्हें? लेकिन उसके मन में उठा यह प्रश्न यूँ ही कहीं खो जाता था. उत्तर उसे कभी ना मिल पाया था. उत्तर पाने के लिए वो केवल रूपेश से पूछ सकती थी उसके सिवा उसे कौन बताता. इसलिए वो भी लाचार थी और अपने पति को इस हाल में देख कर भी कुछ ना कर पाती थी. आखिर करे भी तो क्या जब उसे वजह ही नहीं पाता. इस तरह दोनों ही पति-पत्नी बेसहारा हो जाते थे. एक ना बताकर और एक ना जानकर. ऐसे ही कई साल बीत गए और असमंजसता बनी रही. इसी बीच उन्हे एक प्यारा सा बेटा हुआ. बेटे को पाकर पति-पत्नी बहुत खुश थे. अभी उसका नामकरण नहीं हुआ था. उसे ले कर दोनों सुलेखा के घर जा रहे थे. नामकरण की रस्म वहीं होने वाली थी क्यूंकि सुलेखा की माँ ने ये शर्त रखी थी. वो निकल पड़े गाड़ी चल रही थी अचानक गाड़ी में कुछ खराबी आ गयी और उन्हें रुकना पड़ा. गाड़ी एक गाँव से थोड़ी दूर पर खराब हुई थी. लेकिन वहां जा कर रूपेश को पता चला कि उस गाँव में कोई गैराज नहीं है जहाँ गाड़ी ठीक हो सके. उसने सोचा कि अगले गाँव में जा कर देखता हूँ और पत्नी को बच्चे के साथ छोड़ गया. चलते - चलते उसे 2 घंटे हो गए थे तभी उसे गाँव दिखाई दिया. शाम भी हो चली थी तो सोचा कि जल्दी से गैराज खोज कर किसी मैकेनिक को साथ ले जाता हूँ और गाड़ी ठीक करवा कर उसे भी साथ लाकर गैराज में छोड़ दूंगा. रूपेश इसी सोच में चला जा रहा था कि पीछे से एक गुस्सैल सांड ने उसे उठा कर धरती पर पटक दिया. रूपेश अपनी सुध-बुध खो बैठा और वहीं मूर्छित हो कर गिर पड़ा. उसके बाद उसके साथ क्या हुआ उसे कोई खबर नहीं. मूर्छित अवस्था में उसे अपनी पत्नी और नवजात बेटे का खयाल आया तो वो चीखते हुए उठा तो देखता क्या है कि वो किसी झोपड़ी में लेटा हुआ है और एक वृद्धा उसे हाँथ का पंखा झल रही है. होश में आकर चीखने पर वो वृद्धा बोली " बेटा घबराओ मत अब तुम ठीक हो. तुम्हारे चोट पर हम ने दवा लगा कर पट्टी बांध दी है." यह सब देख कर वो समझ नहीं पाया था कि तभी पत्नी और बेटे के बारे में पूछते हुए उठने का प्रयास करने लगा. वृद्धा ने उसे शांत करते हुए कहा कि तुम्हारी पत्नी और बेटा भी सुरक्षित हैं और हमारे पास ही हैं. तभी उसकी पत्नी झोपड़ी के रसोई से हाथ मे एक प्याली ले कर निकली तब उसकी जान मे जान आई. लेकिन प्याली में क्या था? सुलेखा ने प्याली को रूपेश के मुंह से लगाया और पीने को कहा. उसने बिना कुछ पूछे प्याली में जो था उसे पी लिया और लेट गया. सुलेखा ने बताया कि ये औषधीय काढ़ा है. ये आप को फायदा करेगा. फिर रूपेश ने सुलेखा से बच्चे के बारे में पूछा तभी एक वृद्ध झोपड़ी में बच्चे को लेकर प्रवेश किए और रूपेश से बोले कि आपका बेटा मेरे पास है. वृद्ध को देख कर रूपेश हक्का-बक्का सा रह गया. उस वृद्ध से रूपेश की 10 साल पुरानी यादें जुड़ी हुईं थीं. उसकी आँखों के सामने वो दृश्य घूमने लगा. 
10 साल पहले रूपेश किसी काम से इसी रास्ते से शहर जा रहा था और किसी खयाल में खोया हुआ था. उसे ध्यान नहीं रहा और मोड़ पर गाड़ी मोड़ते हुए उसकी गाड़ी से एक 12-13 साल के बच्चे को टक्कर लग गयी थी और वो बच्चा बुरी तरह घायल हो गया था. उसका पिता ये देख कर उसकी ओर भागा और उसे गोद में उठा कर रूपेश के आगे गिड़गिड़ाने लगा कि हमे अस्पताल ले चलो वर्ना मेरा बेटा मर जाएगा. लेकिन रूपेश को लगा कि मैं इन चक्करों में ना पड़ूं और वृद्ध पिता और उसके बेटे को छोड़ कर गाड़ी चालू कर के आगे निकल ही रहा था तभी वृद्ध ज़ोर से चीख कर रोने लगा क्यूंकि उसका बेटा उसकी गोद में दम तोड़ चुका था. यह देख कर रूपेश सहम गया क्यूंकि उसकी वजह से एक जीव की मृत्यु हो गई थी. लेकिन अब वो कर भी क्या सकता था. वो अपनी गाड़ी ले कर अपने काम के लिए निकल गया. लेकिन उसके दिल में यह घटना और उसकी गलती घर कर गयी थी. यही गलती उसके असमंजस की वजह थी.
रूपेश उस वृद्ध के पैर पकड़ कर रोने लगा और क्षमा की प्रार्थना करने लगा. कहने लगा कि मेरी वजह से आप ने अपना जवान बेटा खो दिया मुझे क्षमा कर दीजिए. मै उस दिन काम के तनाव में था और ध्यान नहीं दिया कि मेरे सामने आपका बेटा आ गया है और उसे अपनी गाड़ी से टक्कर मार कर चला गया. मुझे उस दिन की गलती का पछतावा आज भी है. मेरी इतनी बड़ी गलती के बाद भी आपने मेरी मदद की और मेरा इलाज किया. मेरे परिवार की देखभाल की. आप मेरे लिए देवता से कम नहीं हो. यह सब सुन कर वृद्ध बोला कि बेटा जो गलती तुमने उस दिन की थी अगर आज मै भी वही गलती करता तो मुझमें और तुममें क्या अन्तर रह जाता. मनुष्य जाति को तो एक दूसरे की सहायता करनी चाहिए. शायद यह बात तुम्हें पहले किसी ने सिखाई नहीं होगी. लेकिन आज मैं तुम्हें सिखाता हूं कि आज के बाद कभी भी किसी लाचार की सहायता करने से पीछे मत हटना. शायद तुम्हारे सहारे से किसी की जान बच जाए. वृध्द के मुंह से ये बातें सुन कर रूपेश को ऐसा प्रतीत हुआ कि जैसे कोई ऋषि-मुनि उसे ज्ञान दे रहे हों. 
रूपेश ने पूछा कि आखिर मै यहां कैसे पहुंचा और मेरी पत्नी और बेटा आपको कैसे मिले? तब वृध्द ने बताया कि वो दूसरे गाँव से मजदूरी कर के लौट रहा था तो उसे रूपेश सड़क पर घायल अवस्था में मिला. गाँव से कुछ लोगों को बुला कर उनकी मदद से वो वृद्ध रूपेश को अपने घर ले आया. उसी समय वृद्ध की पत्नी खेत से बकरी चरा कर लौट रही थी और शाम हो चुकी थी. उसने गाड़ी में सुलेखा को बच्चे के साथ देखा तो वहाँ इतने समय अकेले रुकने की वजह पूछी. सुलेखा ने गाड़ी खराब होने की और रूपेश के मैकेनिक खोजने जाने की सारी बात बतायी तो वृद्धा ने उससे कहा कि शायद उन्हें आने में देर हो जाएगी और ये गाँव है यहाँ ऐसे रुकना सही नहीं है मेरे साथ मेरे घर चलो. सुलेखा बच्चे को लेकर वृद्धा के पीछे उसके झोपड़ी में घुसी तो रूपेश को इस हाल में देख कर रो पड़ी. उन्होंने उसे ढाढस बंधाया और बताया कि उसे कुछ नहीं हुआ है और वो लोग उसका इलाज कर सकते हैं. इस तरह से दोनों उस झोपड़ी में पहुँचे थे. 
यह सब जानकार रूपेश ये नहीं समझ पा रहा था कि किन शब्दों में उनका धन्यवाद करे. तभी वृद्ध ने पूछा कि आपलोग कहाँ जा रहे थे? रूपेश ने नामकारण वाली बात बतायी. फिर रूपेश के मन में एक विचार आया. उसने वृद्ध से कहा कि मेरी वजह से आपने अपना बच्चा खोया है तो आज से ये केवल हमारा ही नहीं आपका भी बेटा है. इसका नामकारण आप करिए. ये आज से दोनों परिवार का बेटा कहलाएगा. वृद्ध को यह बात सुन कर अथाह प्रसन्नता हुई. उन्होने कहा कि मेरे बेटे का नाम राहुल था तो आज से इसका नाम राहुल रहेगा. रूपेश नाम सुन कर खुश हुआ. सुलेखा ने भी उन्हें धन्यवाद दिया और रूपेश की बात में सहमति जतायी. रूपेश ने वादा किया कि वो अपने बेटे से ये जरूर बताएगा कि उसके एक नहीं दो-दो माता-पिता हैं. और उनसे मिलाने उनके घर लाता रहेगा. यह सब बातें होने के बाद वो लोग खा-पीकर सो गए. सुबह हुई तो रूपेश क्या देखता है कि झोपड़े में वृद्ध नहीं हैं. बाहर निकल कर देखा तो उसकी पत्नी बच्चे को खेला रही थी. उसने बताया कि वृध्द चाचाजी अगले गाँव से मैकेनिक को ले आए और गाड़ी ठीक करवा दिया है. अब हम माँ के घर जाने के लिए निकल सकते हैं. दोनों ने वृद्ध और वृद्धा का धन्यवाद किया और सुलेखा की माँ के घर के लिए निकल पड़े. वहाँ जा कर माँ को रास्ते की सारी घटना कह सुनाई. माँ ने कहा कि तुम लोगों ने ये बहुत अच्छा किया. नामकरण तो हो ही चुका था तो रस्म में भी वही नाम रखा गया. कुछ दिन वहां बिता कर रूपेश और सुलेखा वापस लौटे. अब रूपेश के मन की असमंजस समाप्त हो चुकी थी. क्यूंकि उसने अपनी गलती की क्षमा मांग ली थी.

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