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स्तब्ध हूं मैं

Poonam Mishra 04 Jun 2023 कहानियाँ समाजिक एक लड़की की समस्या 28924 0 Hindi :: हिंदी

मैं पूनम मिश्रा वाराणसी शहर में ही रहती हूं यही मेरा ससुराल है और यही पर मेरा मायका है जब भी घर में कोई छोटी मोटी परेशानी होती तो माँ ,पापा मुझे फोन करके बुलात्तै और मैं भी अपने ससुराल के सारे काम निपटा करके कोशिश करती कि वहां पहुंचकर उनकी समस्या का समाधान कर लूं ।
जब तक भाइयों की शादी नहीं हुई थी मैं उनकी समस्या को सुलझा देती थी
परंतु भाइयों की शादी होने के बाद भाभी लोग भी आ गई 
मैंने यह कई बार महसूस किया कि मेरा आना जाना उन लोगों को बहुत अच्छा नहीं लगता है ।तो मैं धीरे-धीरे मायके कम जाने लगी अब कभी कभार ही जाती हूं परंतु माता-पिता की यह आदत बनी हुई है कि जब भी उन्हें कोई परेशानी होती है तो उन्हें लगता है कि झट से पूनम को बुला ले उससे पूछ ले कि क्या करें ?कैसे करें ?
मैं अब उनके किसी भी समस्या के समाधान में नहीं पड़ना चाहती।
 मैं चाहती हूं कि उनका अपना परिवार यानी कि मेरा भाई और भाभी उनकी सब समस्या को देखें और उनको समझे ।मैं अपने ससुराल में एक सुखी जीवन व्यतीत करना चाहती हूं ।परंतु इंसान जैसा सोचता है वैसा होता नहीं है ।मैं भी दो बच्चों की माँ मेरे पति रमेश जो कि टीचर है वह बहुत ही सुलझे हुए इंसान है वह कभी भी मुझे कहीं भी आने जाने से मना नहीं करते मेरे द्वारा लिए गए किसी भी निर्णय को वह सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं साथ में सास-ससुर एक पूरे संयुक्त परिवार के साथ रहती हूं क्योंकि मैं अकेली हूं इसलिए मेरे ऊपर बहुत सी जिम्मेदारियां भी रहती हैं घर परिवार के साथ साथ मे बाहर का भी कुछ कुछ काम कर लेती हूं ।
मुझे खुद भी लेखन का बहुत शौक है मैं पत्र-पत्रिका और किताबों में कुछ ना कुछ लिखती रहती हूं ।
इसके अलावा मैं घर से ही छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती हूं. घर पर ही मैंने अपने आपको ,अपने ससुराल में इस तरह से व्यस्त कर रखा है, कि मुझे भी कम ही समय मिलता है कि मैं कहीं जाकर लोगों से 2 -4 घंटा बात कर सकूं या मिल सकूं !
बहुत ही अति आवश्यक होता है! तभी मैं कहीं आना जाना पसंद करती हूं !
अन्यथा अपने घर  में ही  व्यस्त रहती हूं परंतु आज पता नहीं क्यों सुबह से ही पापा का फोन आ रहा था और वह बार-बार कह रहे हैं "पूनम !आ जाओ घर पर जितना जल्दी हो सके !
मैं भी जल्दी जल्दी घर का काम निपटा करके सोची जाऊं मिल आऊं बहुत दिन हो गया ।
घर पहुंचती हूं सामने मुझे मेरी भाभी दिखती है न जाने क्यों ?
वह मुझे देखकर एक अजीब सा मुंह बना कर चली जाती है ।और कहती हैं आ गई है ?अब समस्या का समाधान करेंगगी मैं अपने भाई से पूछती हूं क्या हुआ ?
वह बोलता है अब आ ही गई हो तो पता कर लो !
मुझे न जाने क्यों ?बहुत अजीब सा लगता है मुझे लगता है कि मेरा आना ही गलत है या मैं क्यों आई ?परंतु मैं भी अपने माता-पिता के प्रेम के वशीभूत हूं। मुझे भी इस उम्र में उन्हें इस तरह से किसी भी परेशानी में  देखना अच्छा नहीं लगता ।इसीलिए मैं जब भी वह फोन करके मुझे बुलाते हैं किसी परेशानी में रहते हैं तो मैं तुरंत कोशिश करती हूं कि अपने मायके पहुंच जाऊं। क्योंकि मैं पास में ही रहती हूं इसीलिए शायद मेरा यह संभव भी हो पाता है ।आज जब मैं पहुंची तो पिताजी के कमरे में गई तो मैंने देखा कि चारों तरफ कमरे में सब सामान अस्त-व्यस्त पड़ा है। सारे अलमीरा के कपड़े बाहर पड़े हैं बेड पर बहुत सी फाइलें फैली हुई है ।
 माँ जमीन में अलमीरा में से सारे पेपर निकाल कर के कुछ देख रही है ।खोज रही है !
मैंने पापा से पूछा कि यह क्या हाल बना रखा है ?
क्या खोज रहे हैं ?
आप लोग! पता नहीं आप लोग छोटी छोटी चीजों को भूल कैसे जाते हैं ?
पापा ने कहा कि एक  जरूरी कागज था मेरा तुम्हारी ममाँ को दिया था पता नहीं कहां रख दिया है ।इन्होंने जमीन से संबंधित कागजात थे !मुझे आज लेकर उसे जाना तुम्हारी ममाँ खोजने के दौरान बार-बार बोल रही थी कि पूनम को बुला दो शायद वह देख ले तो कहीं ना कहीं मिल जाएगा! उन्होंने इस फाइल में रखा था पीली वाली में मगर वह मिल नहीं रही है   !
परंतु पता नहीं तुम्हारी ममाँ को क्या हो गया है ?हर चीज भूल जाती है इसे कुछ याद ही नहीं है?
 मैंने अपनी ममाँ की तरह देखा मेरी माँ बहुत ज्यादा पढ़े-लिखी नहीं है ।
परंतु मैंने शुरू से यह महसूस किया है कि वह घर के जितने भी कागजात होते हैं सबको वह अलग-अलग फाइलों में रखती हैं। जैसे मैंने देखा कि बिजली के बिल को वह रेड फाइल में रखती थी कुछ बहुत जरूरी कागजात हो उन्हें वह पीली  फाइल में रखती थी। और पापा को वह समय-समय पर जब भी जरूरत पड़ता था निकाल कर देती थी। और भी बहुत से कागजात उन्होंने संभाल के रखे थे जैसे हम सब भाई बहनों का रिजल्ट नर्सरी से लेकर के ग्रेजुएशन तक का उन्होंने सब का रिजल्ट संभाल के अपने अलमीरा मे रखा ,परंतु वह यह सारे कार्य बहुत ही अच्छे के साथ करती रही है ।और पिताजी को उन पर पूरा विश्वास रहता था। आज भी वह सारे कागज वैसे ही संभाल कर रखती हैं ।परंतु अक्सर आजकल वह चीजें भूल जाती हैं मुझे यह समझ में आता है कि यह उम्र का असर है आखिर 70 ,---75 ,साल की उम्र में इंसान भूल ही जाता है ।सामान को रखकर परंतु माता-पिता इस बात को मानने को तैयार नहीं होते हैं ।कि वह भूलते हैं उन्हें लगता है कि मैं भूलता ही नहीं हूं  अक्सर बोलती है ।कि "मैं भूलती नहीं हूं मुझे अच्छी तरीके से याद है कि मैंने इसी पीली फाइल में ही वह कागज रखी है" पिताजी भी कह रहे थे कि मैंने इसको दिया है। इसी ने रखा है अब पता नहीं कहां चली गई मैं सुबह से इतना परेशान हूं !और तुम्हें थक करके तुम्हें फोन किया !तुम्हारी भाभी भी आए खोज कर चले गए। उन्हें भी नहीं मिला पता नहीं क्यों? मुझे लगा कि पूनम को बुला ले शायद खोज कर बता दे।
 तब मैंने पापा की तरफ देखा और कहा "पापा इस छोटी छोटी चीजों के लिए मुझे मत बोला करिए "मुझे भी कई काम होते हैं' मेरा भी घर से बार-बार निकलना! बच्चों को स्कूल छोड़ना !बच्चों को स्कूल से ले आना !
रमेश का टिफिन बनाना ।फिर यहां आना ।इतना आसान नहीं होता है ।
आप खोज लेते ना !पता नहीं माँ ने मुझे आंसू भरी नजरों से देखते हुए कहा बेटा !तुम खोज दोगी तो शायद मिल जाए "देख लो सारी फाइलें पड़ी हुई है ?
सब मुझे डांट रहे हैं मैंने कहा था पूनम को बुला दे 'वह खोज दे तो शायद मिल जाए !
बेटा देख ले एक बार ध्यान से !मैंने माँ से कहा तुम हटो? वहां ?से हटो !!मैं देखती हूं !!मैं फौरन मम्मी को वहां से हटाती हूं और सभी कागजों को देखने लगती हूं। तभी मैं अचानक!!! देखती हूं कि जहां मेरी ममाँ बैठी होती है फाइलों के बीच में वह उसी फाइल पर बैठी रहती है ।
जिसमें कागज को खोज रही होती है ।मैं पापा को उठा कर देती हूं बोलती हूं ।देखिए!! यह कागज जहां है इसी पर बैठकर खोज रही हैं माँ?
 पापा न जाने क्यों ?माँ को डांटने लगते हैं ।ममाँ एकदम चुपचाप होकर कुर्सी पर बैठ जाती है !!नजर झुका कर" पापा की बात सुन रही होती है ।
मुझे कुछ बुरा लगता है तो मैं पापा को बोलती हूं "आप इतना  क्यों डांट रहे हैं ?उन्हें क्या पता? था ? कागज के नीचे वह खुद बैठी हुई है !!अब मिल गया ना! आप जाइए अपना काम करिए।
 पापा कागज लेकर घर से बाहर निकल जाते हैं ।मैं ममाँ के पास बैठी उन्हें देखती हूं न जाने क्यों मन में मैं सोचने लगती हूं यह वही ममाँ है जिसने इतने बड़े परिवार को संभाल रखा था। हम सब का टिफिन बनाना  स्कूल भेजना, पापा को ऑफिस भेजना, सब को पढ़ाना ,लिखाना इस योग्य बनाया। आज  माँ चीजें रख कर भूल जाती हैं। तो सारा परिवार उन्हें कुछ न कुछ बोलता है । यह मुझे अच्छा नहीं लगता मैं ममाँ को अपने गले से लगा लेती हूं !माँ न जाने क्यों ?रोने लगती है मैं माँ को बोलती आप रो क्यों रही है ?हो जाता है ,कभी-कभी किसी को याद नहीं रहता है ।
परंतु मैं मन ही मन सोच रही हूं बच्चों के स्कूल का आने का टाइम हो गया है ।मैं जाऊं मैं ममाँ की आज्ञा से अपने घर चली जाती हूं। मैं फिर से अपने घर गृहस्ती की जिम्मेदारियों में व्यस्त हो जाती हूं। कुछ दिन के पश्चात फिर पिताजी का फोन आने लगता है। कई बार बार-बार फोन आने पर मैं फोन उठाती हूं पूछती हूं कि पापा कैसे हैं? क्या हुआ ?सब ठीक है ना !!तब पापा बोलते हैं बेटा तुमसे कुछ बात करनी थी। आ जाओ !!तुम्हारी माँ ने तुम्हें बुलाया है ।चली जाना एक-दो घंटे के बाद चली जाना !!मैं पापा से यह बात कह नहीं पाती की आपके घर के ही कुछ लोग मुझे देखना पसंद नहीं करते ।मेरा आना उन्हें पसंद नहीं है लेकिन!!! फिर मैं अपने पिता से यह बात नहीं कह पाती क्योंकि वह तो पिता होते हैं !!उन्हें इन सब बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता ।पता नहीं क्यों ?
मुझे अपने भाई और भाभी के उपेक्षित व्यवहार का बहुत असर पड़ता है ।मुझे लगता है कि वह मुझे उपेक्षित कर रहे हैं ।मेरा बार बार आना उन्हें पसंद नहीं है ।
मैं इस बार कोई बहाना बनाकर वहां आने से इंकार कर देती हूं।
 अब मैं सोचती हूं कि वह अपनी समस्या खुद सुलझा लेंगे !!मैं इन छोटी-छोटी चीजों के लिए ना जाया करु और मैंने धीरे-धीरे जाना बंद कर दिया ।
मैं जैसे-जैसे अपने मायके से अपने आप को दूर कर दी गई मैंने महसूस किया कि माता-पिता का फोन भी कम ही  आता है ।और वह मुझे अब अपनी समस्याओं के बारे में कुछ भी नहीं बताते। शायद वह अपने परिवार में ही सब सुलझा लेते होंगे !!मुझे अच्छा लगता था! कि वह खुश है। अपनी दुनिया में और मैं खुश हूं अपने ससुराल में !क्योंकि जब बेटियां अपने ससुराल में होती हैं। तो उन्हें माँ पिता की बहुत चिंता होती है वह उनसे दूर होती हैं। परंतु उन्हें अपने माँ-बाप का ध्यान बहुत रहता है।
 लेकिन जब दोनों तरफ से जिम्मेदारियां उनके ऊपर पड़ती हैं। तो जितना महत्व वह अपने मायके को देती है ।उतना महत्व अपने ससुराल को भी देती है। ससुराल के लोग शायद उनके इस महत्व को समझ ना पाए ।परंतु एक लड़की दोनों ही रिश्तो को बना करके चलना चाहती है। क्योंकि "समाज में यह दोनों ही उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं !भले ही लोगों को लगता हो कि लड़कियां अपने मायके को ज्यादा पसंद करती हैं।
 ससुराल को कम ,,,,,पसंद करती है यह समाज की धारणा है ,,,,परंतु ऐसा होता नहीं है,,, क्योंकि बचपन से यह कहा जाता है कि पति का घर ही तुम्हारा घर है !जब उन्हें यह बात पता रहती ही है कि वही मेरा घर है तो बड़ी होकर भी वह पति के सभी रिश्तो को उतना ही सम्मान देती है जितना वह अपने मायके के रिश्तो को देती है ,,,,
खैर यह मेरी ऐसी सोच है सभी के लिए यह मेरे विचार लागू नहीं होते हैं ,,,क्योंकि सभी अपनी जिंदगी में अपने अपने हिसाब से जिंदगी जीते हैं ,,,और अपने रिश्तो को बनाए रखने का सबका अलग-अलग तरीका होता है,,,  मध्यम वर्गीय परिवार में लड़कियां ज्यादातर रिश्तो को ही लेकर चलती है !!ऐसा मेरा विचार है कहां तक मैं सही हूं यह मुझे नहीं पता ,,,,खैर यह तो मेरे अपने विचार हैं !!परंतु कई वर्षों के पश्चात आज मेरे पिताजी का फोन फिर सुबह सुबह आना शुरू हो गया सुबह तो मैं बहुत काम में व्यस्त थी मैं फोन नहीं उठा पाई क्योंकि बच्चों के स्कूल का समय था मैं जब अपने काम से फ्री होकर कि फोन उठाती हूं तो देखती हूं पापा के कई कॉल थे !!मैं कॉल बैक करती हूं ,,और पापा से पूछती हूं क्या हुआ ?पापा !!सब ठीक है ना !!तब पापा बोलते हैं सब ठीक नहीं है बेटा!! जल्दी से घर आ जाओ तुम्हारी माँ की तबीयत खराब है !!मैं झटपट सारे काम निपटा करके ऑटो करके घर पहुंचती हूं न जाने क्यों ?मन में एक घबराहट सी हो रही होती है ,,कि मैं अपनी ममाँ को इतना समय नहीं दे पाती जितना मुझे देना चाहिए !!!परंतु मैं क्या करूं? मेरी भी कुछ मजबूरियां है ,,,,मैं घर पहुंचती हूं तभी मेरी भाभी सामने पडती है वह कहती है आ!! गई अब सब यह देख लेंगी  वह अपने कमरे में चली जाती है। मैं अपने भाई से पूछती हूं क्या हुआ ?ममाँ ठीक है ना वह बोलता है "आई हो तो खुद ही देख लो "मैं ममाँ के कमरे में जाती हूं देखती हूं ममाँ लेटी हुई है मैं उनके पास जाकर बोलती हूं ममाँ आप कैसी हैं ?वह मुझे देखती है कौन पूनम?
 अरे बेटा इतना तुम्हारे पापा दिन भर से फोन लगा रहे थे !!तुम फोन नहीं उठाई ,,,,,पता नहीं क्या करती हो ?फोन नहीं उठाती हो पापा का ,,,,सुबह से ही कह रहे थे पूनम को फोन कर लो !!कर लो !!मैं उन्हें कैसे बोल पाती कि मैं  व्यस्त थी मुझे यह कहने में भी शर्म आ रही थी ।माँ की इतनी तबीयत खराब है मुझे कुछ भी कहने में शर्म आ रही थी ,,,और मैं कैसे कहूं !!कि मैं क्या कर रही थी!! मैंने ममाँ से कहा मैं आ गई हूं अब आप ठीक हो जाएंगे ,,,,कुछ नहीं होगा आपको,, लेकिन पता नहीं क्यों? मन अंदर से बहुत घबरा रहा था ऐसा लग रहा था कि नहीं!! मेरी माँ की बहुत तबीयत खराब है। पापा बार-बार उन्हें देख रहे थे!! डॉक्टर आकर उन्हें चेक किया और डॉक्टर ने कहा कि बस आप इनकी सेवा करिए ,,इन्हें कोई परेशानी नहीं है ,,यह उम्र का असर है बाकी सब भगवान के ऊपर छोड़ दीजिए।
 मैं मा माँ के पास बैठी  मन ही मन सोच रही थी !!मैं कुछ कर तो नहीं पाती !!!सिर्फ आती हूं एक-दो घंटे रहती हूं !!और चली जाती हूं !!इतने में ही माँ ,पिताजी खुश हो जाते हैं  । और मुझे लगता है कि मैं बहुत कुछ कर देती हूं !!क्या करती हूं !!सिर्फ समय ही तो देती हूं इनके पास बैठती हूं  इन्हें अच्छा लगता है। फिर मैं वापस अपनी गृहस्थी में चली जाती हूं !!भाई भाभी है साथ में लेकिन उनका भी अपना परिवार है !उनके भी बच्चे हैं!! उनकी भी अपनी जिंदगी है ?वह अपने आप में बिजी रहते हैं! मैं भी तो वैसे ही हूं !!मैं भी तो अपने परिवार में व्यस्त रहती हूं मैं भी कितना समय इनको देती हूं बस जब कभी फोन आता है तो मैं भागी भागी आती हूं !!क्यों मेरी जिम्मेदारी नहीं है !!!इनके प्रति !मैं क्यों नहीं अच्छे से इनका ख्याल रखती ??पता नहीं क्यों ??मन में हो रहा था कि माँ को अपने साथ अपने ससुराल ले जाएं परंतु मेरे माता-पिता पुराने ख्यालों के हैं वह मेरे सास-ससुर के साथ रहना पसंद  नहीं कर सकते ।
मैं इन दोनों परिवारों को एक बराबर समय नहीं दे पा रही थी ।मैं जब मायके आती तो ससुराल की चिंता होती ।और जब ससुराल में रहती तो मायके की चिंता होती ।मैं इसी उधेड़बुन में म माँ के पैर धीरे-धीरे दबा रही थी तभी माँ ने मुझे इशारे से अपने पास बुलाया वह मुझसे कुछ कहना चाहती थी ।परंतु पता नहीं क्यों ?उनके गले से कुछ आवाज नहीं निकल रही थी ?मैं घबरा गई!! दौड़ कर बाहर निकली और पापा को  आवाज दिया ।कि आपको  माँ बुला रही है ।शायद कुछ कहना चाहती हैं !!मुझे नहीं समझ में आ रहा था कि वह क्या कहना चाहती हैं ?पापा दौड़े-दौड़े आए माँ के पास बैठकर उनकी तरफ़ देखने लगे वह कुछ इशारे से बता रही थी मगर शायद पापा उनकी बात को समझ रहे थे !!मैं नहीं समझ पा रही थी !!
वह समझा रही थी कि आप  मेरे जाने के बाद अच्छे से रहिएगा!! बेटा बहू की बात मानिएगा !!जिद मत करिएगा !!किसी को परेशान मत करिएगा !!समय पर खाना खा लीजिएगा !अपनी दवा ले लीजिएगा !!पापा उनकी हर बात को शायद समझ रहे थे तभी वह कह रहे थे कि हां ठीक है मैं कुछ भी परेशान नहीं हाऊगा मैं समय पर दवा खा लूंगा! समय पर खाना खा लूंगा !किसी को भी परेशान नहीं करूंगा !!तुम बस ठीक हो जाओ ,,,तुम्हें कुछ नहीं हुआ है !!तुम ठीक हो जाओगी !! मैं ठीक से  रहूंगा !!तुम परेशान मत हो !!तुम ठीक हो जाओगी !!न जाने कब माँ पापा को सब बातें समझाते समझाते आंख बंद कर ली मैं वही खड़ी देखती रह गई!!! पता नहीं क्यों ?मैं एकदम स्तब्ध थी ?मैं अपने पिता को देख रही थी ,,,,कभी अपनी माँ को देख रही थी !!!मैंने अपने भाई और भाभी को आवाज लगाई वह सभी दौड़े-दौड़े नीचे आए!!! मृत्यु के आगे किसी का बस नहीं चलता ,,,,,मेरी ममाँ इस दुनिया में अब नहीं रही !!!कुछ समय पश्चात मैं अपने ससुराल में पुनः वापस आ गई माँ की कमी तो बहुत खलती है ,,,अब पापा का फोन भी नहीं आता वह मुझे बार-बार फोन नहीं करते ,,,,अब मुझे वह यह नहीं कहते कि "आओ पूनम  तुम्हें माँ याद कर रही है !!!आज कई महीनों के बाद फिर पापा का फोन आया! मैंने पापा से पूछा सब ठीक है !!पापा आप कैसे हैं?? उन्होंने कहा हां सब ठीक है!! बेटा चली आती घर पर थोड़ा तुमसे कुछ काम था !!मैंने पूछा क्या हुआ ?पापा !!सब ठीक है!! उन्होंने कहा कि हां बेटा सब ठीक है बस तुम चली आओ !!
मैं सीधे बस स्टैंड से बस पकड़ कर अपने घर पहुंचती हूं ।
सीधे पापा के रूम में जाती हूं !!घर कितना खाली खाली लग रहा होता है ,,,मायका ममाँ ,,,से ही होता है ,,,जब  माँ नहीं होती है ।तो घर एकदम खाली पड़ा रहता है ,,,मैं पापा के कमरे में जाती हूं तो देखती हूं कि पापा रामायण की किताब खोल कर बैठे रहते हैं!!!और पूरे कमरे को अस्त व्यस्त किए रहते हैं !!सब सामान फैला रहता है ,,,मैं पूछती हूं पापा इतना आपने क्यों फैला रखा है?
 क्या खोज रहे हैं ?
तब पापा मेरी तरफ देख कर बोलते हैं "मैं तुमसे फोन पर नहीं बोला बेटा" मेरा चश्मा नहीं मिल रहा है "मैं सुबह से खोज रहा हूं!! मुझे रामायण पढ़ना है !!मैंने सोचा मैं तुम्हें फोन करके परेशान करूंगा तुम परेशान हो जाओगी!! जाते समय तुम्हारी ममाँ ने कहा था कि पूनम को बार-बार फोन करके मत बुलाया करो वह ससुराल में रहती है उसकी भी अपनी कई जिम्मेदारियां हैं अपना  सामान सही जगह पर रखना ।
मैं देखकर स्तब्ध थी !!!कुछ समझ में नहीं आ रहा था !!कि मैं पापा को क्या बोलूं ??
पापा !!!चश्मा अपने सर के ऊपर चढ़ाए हुए थे !!!मैंने पापा को उनका हाथ पकड़कर कुर्सी पर बैठाया ।
और बोला "पापा आराम से बैठिए" आपका चश्मा यही है" आपके सर के ऊपर !!!मैंने चश्मा उनकी आंख पर चढ़ा दिया !और वह मुझे देख कर मुस्कुराने लगे!! पता नहीं क्यों ?मुझे माँ की याद आ गई !!मैं वही सामने कुर्सी पर बैठकर रोने लगी !!!
पापा मुझे रोता देखकर बोलने लगे क्या हुआ ?क्यों रो रही हो? क्या हुआ ???क्यों रो रही हो ??मैं बस चुपचाप उन्हें देख रही थी!!! आंखों से आंसू गिरते जा रहे थे !!वह बार-बार पूछ रहे थे किसी ने तुम्हें कुछ कहा क्या ?
कोई परेशानी है ?क्या ?
मैं एकदम चुप सिर्फ उन्हें देख कर रोए जा रही थी!!!!


  स्वरचित लेखिका पूनम मिश्रा

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