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थप्पड़

Laxmi lshwar Joshi 30 Mar 2023 कहानियाँ अन्य थप्पड़ 83617 0 Hindi :: हिंदी

 बात उस समय की है जब मैं छठी कक्षा की छात्रा थी पाठशाला शुरु हुई है दो-तीन महीने ही हुए होंगे सभी छात्र छात्राओं को फ़ीस माफ़ का फॉर्म दिया गया 2 दिन बाद फॉर्म भरकर दंडाधिकारी जी के ईस्टम्प के साथ साइन करा कर लाने को कहा गया । हम पांचों सहेलियां अपना-अपना फार्म भरकर दंडाधिकारी जी के दफ्तर पहुंची । हमने अपने अपने फॉर्म में दे दिए ,और ठप्पा मार साइन करके  देने को कहा , इस पर वे बोले अभी जाओ तीन-चार दिन बाद आना , सभी छात्राएं चुप रही पर मेरे ही मुंह से निकल गया सर 2 दिन बाद यह फार्म हमें शाला में जमा करवाना है तो आप अभी साइन  कर दे तो बड़ी मेहरबानी होगी वो जोर से चिल्लाई और ऊंची आवाज में कहा नहीं मैं 2 दिन बाद ही साइन करूंगा  अब तुम लोग जाओ हम सभी छात्राएं वहां से मन मसोसक कर चली आई 2 दिन बाद गए तो उन्होंने सभी के फॉर्म दे दिए पर मेरा फॉर्म रोक लिया मैंने उनसे पूछा सर आपने सभी के फॉर्म तो दे दिए , पर मेरा फोन क्यों रोक लिया । तो वह बोले अभी मेरा मूड नहीं है , तुम दो-तीन दिन बाद आना दूसरे दिन जब मैं स्कूल गई तो मुझे कक्षा से बाहर निकाल दिया गया कारण यह था कि मैं उस दिन भी फ़ीस माफ़  का फॉर्म साइन करवा कर नहीं लाई थी । मैं लगातार तीन दिन तक दंडाधिकारी जी के दफ्तर के चक्कर लगाती रहीं । उनका हर बार जवाब नहीं होता होता था , मैं अभी बाहर जा रहा हूं कल आना शाम को आना शाम को गए तो  सुबह आना आखिर थक कर बड़ी हिम्मत की और कहा सर अब तो फॉर्म दे दीजिए । अब अंतिम तारीख भी निकल चुकी है । मुझे कक्षा में बैठने नहीं दिया जा रहा है । मैं उनके सामने गिड़गिड़ा रही थी  पर उन पर कोई असर नहीं हो रहा था । मेरी व्यथा  देख उस समय कुछ लोग उनके साथ थे । उनमें से किसी ने कहा यार अब तो साइन कर ही दो विचारी बच्ची कितनी मिन्नतें कर रही है । इस पर दंडाधिकारी जी के स्वाभिमान को ठेस पहुंची और गुस्से में लाल पीले होने लगे और उन्होंने आव देखा ना ताव तपाक से मेरे गाल पर एक थप्पड़ जड़ दिया मैं वहां से बिना फॉर्म लिए रोती हुई वापस घर आ गई उस दिन के बाद मेरे बाल सुलभ मन  में सरकार के प्रति हीन भावना पनपने लगी  इस  घटना से मेरे मन में शासन में जिन का हस्तक्षेप होता था उन लोगों के प्रति नफरत सी हो गई । घर आकर पिताजी को बताया घर में डांट पढने के डर के मारे ज्यादा कुछ कह भी नहीं सकी पिताजी मेरा फॉर्म स्टैंप लगाकर तथा साइन करवा कर ले आए।  दूसरे दिन लेट फीस के साथ फॉर्म जमा करवा दिया गया । मैंने भगवान से प्रार्थना की कहा हे प्रभु यह व्यक्ति अगर चाहता तो मेरा काम 2 मिनट में कर सकता था  । इसने मुझे बहुत परेशान किया थप्पड़ भी मारा ,आप इसे इसके किए की सजा जरूर देना । ना चाहते हुए भी मेरे दुखी मन से दंडाधिकारी के लिए बद्दुआ निकल रही थी । यह बात मेरी स्मृति पटल पर पत्थर की लकीर की तरह अंकित हो  गई । समय बीतता गया मैंने खूब मन लगाकर पढ़ाई की और अपना  सपना पूरा किया कुछ दिनों बाद पिता जी को विवाह की चिंता सताने लगी ।  काफी खोजबीन के बाद मेरा भी एक अच्छे परिवार में रिश्ता तय कर दिया गया ।  मैंने परिवार के सदस्यों से सुना था कि मेरी ससुराल वालों की राजनीति में अच्छी पकड़ है । मेरे ससुर जी एक अच्छे औहदे पर  है , बड़ी धूम धाम से मेरा विवाह सम्पन हो गया । इसी के साथ मयके का आँगना छोड़ ससुराल की दहलीज पुज़ कर गृह प्रवेश किया । कहते है ससुराल में एक बार फिर स्त्री  का नया  जन्म होता है   ससुराल  में कारोबार बड़ा था । किसी चीज की कोई कमी नहीं थी । विवाह के 2 वर्ष बाद मेरे परिवार वाले चाहते थे कि मैं राजनीति में आउ लेकिन मेरा राजकाज से दूर दूर तक का कोई लेना-देना नहीं था ।  ना इसके बारे में मुझे कोई अनुभव था । और ना मैंने कभी अपने माता-पिता के घर में इस तरह का माहौल देखा था ।  राजनीति के नाम से मुझे अजीब सी घबराहट महसूस होने लगती थी । उस पर  न  चाहते हुए भी वह अनचाहा थप्पड़ याद आ जाता था विवाह के 2 वर्ष बीत चुके थे । इस बीच नगर परिषद के चुनाव आए हमारा वार्ड महिलाओं के लिए रिजर्व (आरक्षित) होने की वजह से मेरे घर वाले भी मुझे  चुनाव लड़ने के लिए जोर दे रहे थे ।  मैं अपने जवाब में टालमटोल करती कभी हंसी में टाल देती तो कभी इस विषय को ही बदल देती ,लेकिन जैसे ही फॉर्म भरने का दिन नजदीक आया , मेरे पति ने मुझसे बड़ी शालीनता से चुनाव में खड़े न होने की वजह जाननी चाही  । मैंने पहले कई  वजह बताई परंतु वे समझ गए कि इन सब के पीछे कुछ कारण तो जरुर है तब उन्होंने कहा तुम मुझसे कोई बड़ी बात छुपा रही हो । अगर तुम मुझे अपना समझती हो तो मुझे पूरी बात खुल कर बताओ । नहीं माने तब  मैंने बचपन का वह थप्पड़ वाला प्रकरण है उन्हें सविस्तार सुना दिया । यह सुनते ही उनकी आंखें छलक पड़ी । और वे तुरंत बोल पड़े । अगर ऐसी बात है तो अब तुम चुनाव जरूर लड़ोगी ।  हमें उन्हें इस थप्पड़ का जवाब जो देना है । हम उन्हें बताएंगे कि अपने अधिकारों का सही इस्तेमाल कैसे किया जाता है । मुझे लगता है कि तुम नगर सेविका के रूप में , अपना पहला कदम राजनीति में रखो , पर मुझे यह सब ज्यादा पसंद नहीं था ।  परंतु मेरे पति चाहते थे कि मैं इस क्षेत्र में आगे बढ़कर समाज सुधारक के रूप में अपना योगदान दु  चुनाव का प्रचार बड़े जोर शोर से शुरू हुआ ।  देखते ही देखते मतदान का दिन नजदीक आया । आज मतदान हुआ नतीजें चौकाने वाले  थे ।  मैं पूरे गांव में सबसे ज्यादा मतों से विजयी  हुई मै शिक्षित एवं सबसे कम उम्र होने की वजह से मुझे सब का बहुत ज्यादा स्नेह मिला करता था । मुझे कभी किसी प्रकार की कोई तकलीफ महसूस नहीं हुई । धीरे-धीरे मेरी कड़वाहट भी कम होती गई  । समाज कार्य तथा समाज सेवा में मेरी रुचि बढ़ने लगी  ।  लोग कहते थे अभी तक तो बुर्के वाली सेविका देखा है पहली बार हमने सभागृह में घूंघट वाली नगर सेविका देखी । इस पर सब हंसने लगते अब इसे  प्रबल राजयोग कहिए  या तकदीर का लिखा समझिए । उस समय मेरे पति ही मेरे सबसे अच्छे दोस्त और मार्गदर्शक थे । मैंने उनकी छत्रछाया में रहकर हर छोटी-बड़ी समस्याओं  का ,डटकर मुकाबला किया वे चाहते थे कि ऐसा कोई भी काम न  हो जो तुम नहीं कर सकती । उनके विचार मुझमें आत्मविश्वास भर देते थे । परिवार के सभी सदस्यों का  अविस्मरणीय योगदान रहा । नगर सेविका के पद पर रहते हुए मैंने कई और भी पदों पर काम किया एक बार  शिक्षण समिति की सभापति के रूप में मेरा चयन किया गया । उसी दौरान हमें मुंबई अधिवेशन में सम्मिलित होने का अवसर प्राप्त हुआ । हम लोग अधिवेशन हॉल के बाहर खड़े थे , अधिवेशन शुरू होने में अभी कुछ वक्त बाकी था । हम काफी सारे लोगों के साथ बाहर बरामदे में खड़े थे , इतने में एक बड़ी उम्र का व्यक्ति मेरे सामने आया और कहने लगा । मैडम आप अपना 2 मिनट का समय मुझे  दोगी वह कह रहे थे । और मैं उन्हें आश्चर्य चकित फटी फटी आंखों से एक टक देख रही थी ।  इतने में मेरी एक सहयोगी मित्र ने कहा सभी अंदर जा चुके हैं ।  अधिवेशन बस अभी शुरू ही होने वाला है । जल्दी चलो कहते हुए मेरा हाथ पकड़ कर ले गई । अभी मेरा मन जो देख कर आए वह मानने को तैयार न था । पर मैंने उन्हें जैसे ही देखा बचपन की वो तकलीफ वाली  घटना , मेरी आंखों  में सजीव चित्रण की तरह उभर रही थी ।  मानव व घटना आज ही घटित हुई हो , पूरा सभागृह खचाखच भरा होने के बावजूद ऐसा प्रतीत हो रहा था, जैसे मैं वहां अकेली ही हूं , मुझे ऐसा आभास हो रहा था मानो मैं मेरे बचपन में वापस लौट गई हूं।  और उस अधिवेशन में काफी सारे प्रस्ताव लेकर आई थी । कुछ पास करवाने थे । कुछ पर चर्चा होनी थी । मैं सब भूल गई , बस मुझे बार-बार दंडाधिकारी जी का वह  थप्पड़ याद आ रहा था । जैसे तैसे मैंने उस कठिन समय  में अपने आप को संभाले रखा,  समय निकलता गया,  जहां हमारे ठहरने की व्यवस्था की गई थी,  उसी स्थान पर लौटने के लिए हम लोग रवाना हुए , वहां पहुंचकर मैं विचारों के समंदर में गोते लगा रही थी , तभी मुझे शोर  सुनाई पड़ा , कोई जोर जोर से किसी को भगा रहा था । मैंने खिड़की से बाहर देखा , तो वही दंडाधिकारी जी थे । मैंने जोर से आवाज लगाई और दरबान से कहा उन्हें सम्मन पूर्वक  अंदर आने दो । अंदर आए मैंने उन्हें देखा वह पसीने से तरबतर हाफ रहे थे । मानो काफी देर से अंदर आने के लिए मशक्कत कर रहे हो । मैंने उन्हें एक गिलास पानी ला कर दिया । उन्होंने राहत की सांस ली मैं कुछ बोल पाती , उसके पहले ही उन्होंने बोलना शुरु कर दिया।  वो  कहने लगे बेटी ,  फिर पलट कर  कहने लगे मैडम , अपने गांव में कन्या शाला है । उसके लिए हमें कुछ फंड की आवश्यकता है।  सालो की इमारत हैं जर्जर हो रही है कभी भी गिर सकती है । मैंने यहां किसी से सुना है कि आप नागपुर जिले की काटोल  तहसील की  रहने वाली हो  इस लिए मैं आप के पास चला आया । मैं भी पास  की कामठी तहसील से आया हूं । इतना सुनते ही मेरी आंखें नम हो गई । मानो  ह्रदय फूट-फूट कर रो रहा था ।  मैंने उन्हें कहा सर शायद आप मुझे पहचानते नहीं । मैं वही कक्षा छठी की छात्रा हूं , जो आपके पास लगातार तीन दिन तक सिर्फ एक फॉर्म पर  साइन  करवाने के लिए चक्कर काटती रही । और आप मुझे दूत  करते रहे । और फिर मुझे थप्पड़ मारा । उन्होंने याददाश्त पर जोर  दिया शायद उनको भी कुछ धुंधली याद ताजा हो आई । और आत्म ग्लानि से भर गए , शर्मिंदगी से मेरे पैरों में गिर गए । और कहने लगे , बेटी ऊपर वाले का न्याय देखो         15 वर्ष पहले जहां मैं खड़ा था वहां तुम हो ।  तुमसे बुरा व्यवहार किया , अपने अधिकारों का गलत इस्तेमाल किया , इस वजह से मैं तुम्हारे सामने अपने आप को बहुत ही तूछ  महसूस कर रहा हूं ,  बेटी मेरा अपराध क्षमा योग्य तो नहीं , लेकिन मैं अपनी जान भी दे दूं तो , बीता समय वापस नहीं ला सकता ,
 उन्हें अपनी गलती का एहसास हो  हो रहा था । सर मेरा आपका दिल दुखाने का बिल्कुल मतलब नहीं था । मैंने उन्हें समझाते हुए कहा  सर मैंने आप से अपमानित होने के बाद ही , ठान लिया था ।  कि जीवन में हमेशा  छोटे से छोटे व्यक्ति का सम्मान करूंगी ।  क्योंकि आपमान  रूपी जहर पीने के बाद , इंसान को जो दुख का सामना करना पड़ता है , वह मैंने महसूस किया है । यह सीख मुझे आपके द्वारा थप्पड़ खाने के बाद ही मिलि । जो आज मेरे जीवन की  अमूल्य धरोहर है । इसी के बल पर आज मैं लोगों के हृदय पर  राज करती हूं ।  मुझे ससुराल में बहू का नहीं , बल्कि बेटी का दर्जा प्राप्त हुआ है । सर इसके लिए मैं आपकी ताउम्र शुक्रगुजार रहूंगी  । कहते हुए उनके पैर छू के  
आशिर्वाद लिया । उनकी आँखों से आसुओं की अविरल धार न जाने कितनें हो सवालो को जन्म दे रही थी ,,.,,,,,,,,,????

               लक्ष्मी जोशी  '' ईशु ''
                  काटोल (महा.)

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