महेश्वर उनियाल उत्तराखंडी 21 Jun 2026 कहानियाँ समाजिक 2713 0 Hindi :: हिंदी
‘‘ठोकरें’’ जब तक न लगे ठोकर कुछ भी न पता होता है, आसान है, सब दुनिया में बे फिक्र होके सोता है। ख्वाबों में ही रहता है और सपने संजोता है, खुशियों के ही बीज अपने दिल में बोता है। ठोकरें जब लगती है तब अहसास उसे होता है, सारी खुशियां अब तो पल भर में वह खोता है। संभल जाते है वही लोग अक्सर जो ठोकरें खाते है, सहते है दर्द वो वेशक पर अपनी मंजिलें पाते है। विफलता से बार-बार जो सीखते ही जाते है, इतिहास बनाते है नया दुनिया कदमों में झुका जाते है। जिसने भी खायी ठोकर उसने मुकाम पाया, सीखा है उसने चलना दुनिया को भी सिखाया। अब्दुल कलाम जी हो या फिर हो नरेन्द्र मोदी, भीम राव जी हो या फिर, आदि योगी, सीखातें है यही, कि खाओगे गर ठोकरें, तो फिर विजय तुम्हारी होगी। रचनाकार- महेश्वर उनियाल 7579155644