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मानसिक सीमा

Santosh kumar koli ' अकेला' 30 Mar 2023 कविताएँ अन्य मानसिक सीमा 16011 0 Hindi :: हिंदी

बिन धरातल, बिन तूलि अबीर।
खिंच गई, अमिट लकीर।
फौलादी आभासी, हूत हठीली।
टकराकर सोच, पड़ गई ढीली।
पता नहीं कब, इसे स्वीकार कर लिया।
इसके साथ जीने, मरने का सबर लिया।
कुछ हासिल, नहीं कर सका।
इससे परे का मज़ा, नहीं चखा।
मान लिया मैंने इसे, सुरक्षा दीवार।
विचारों को जब डाल मिले, कैसे हो अनंत दीदार।
अब नहीं, कुछ रहा है शेष।
मैं ही इसका, ब्रह्मा, विष्णु, महेश।
शेष रह गई, केवल गाथा।
काश, समय रहते तोड़ पाता।
बग़ावत करूं, तो किससे करूं।
ये जीए तो मैं, ये मरे तो मैं मरूं।
मैं हूं इसका, प्रतिबिंब।
इसके आगे, मैं बन गया डिंभ।
इतनी धुंधली, धूमिल कच्ची-सी।
कब हो गई, स्पष्ट पक्की-सी।
अब ये मेरी नहीं, मैं इसका बन रह गया।
दुनिया फंसी मकड़ जाल में, संतोष कुमार कह गया।

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