Santosh kumar koli ' अकेला' 30 Mar 2023 कविताएँ अन्य दुनिया का रिवाज़ 16345 0 Hindi :: हिंदी
तेरी है, न मेरी है, ये दुनियादारी है। अपना-पराया कोई नहीं, मतलब की यारी है। मजबूरन ऊपर बैठ, करना सिंह सवारी है। बिना म्यान की, तेज़ तलवार दुधारी है। ये न पहले ठीक थी, न ठीक आज है। यही, दुनिया का रिवाज़ है। अर्श को फ़र्श से देखकर, यह खीझती है। पर रंज रंगत से, फलती-फूलती है। कहती ज़्यादा, कम सुनती है। दूसरों के आंसुओं से, कली-कली खिलती हैं। राजा करे तो न्याय, प्रजा करे तो एतराज है। यही दुनिया का रिवाज़ है। यही दुनिया का रिवाज़ है। दूसरों को थोड़ा गिराने, हद से गुज़र जाती है। दूसरों के जीने से, यह जीते-जी मर जाती है। उल्टी रीत दुनिया की, उलट-पुलट कर जाती है। इसका रंग निराला, निराला ही अंदाज है। यही दुनिया का रिवाज़ है। गिरे हुए के ज़्यादा, लगती हैं दो लात। टांग खींचती है, थामना हो जब हाथ। अपनों के विश्वास से, करती है विश्वासघात। अधर्मी, इसका न ईमान न कोई जात। वही हार गया, जो दुनिया साज़ है। यही दुनिया का रिवाज़ है। यही दुनिया का रिवाज़ है।