Ratan kirtaniya 30 Mar 2023 कविताएँ देश-प्रेम एक किसान मानव - ममता का बीज बोता है अंकुर ना फूटने का मर्मिक चित्रण है अंकुर को क्रांति वीर रुप में वर्णन है 32836 0 Hindi :: हिंदी
अबोध बालपन -
कितना नादान -
बड़ा होकर बनूँ किसान ;
यहीं सोचता रहा -
एकाग्रता से पिता का श्रम देखता रहा -
मेरा नादान बालपन सपना सजाता रहा -
बालपन की कौतूहल ;
बड़ा होकर -
पिता जी की तरह चलाऊँगा हल ।
बालपन तो खेल - खेल में बीताया ;
ना भूला उसे -
मैं ने जो सपनें सजाया ;
कितना हर्ष - उल्लास की बात है ;
साकार हो सपना -
कर्म - भू करती स्वागत है ,
कितना अंतर्यामिनी कौतूहल ;
बन गया किसान -
चलाऊँगा हल ;
बीज की अंकुर उगलेगा ,
फसल खनकेगा -
मान - सम्मान भी झलकेगा ।
मैं अबोध -
खेत में हल जोतकर ;
मैं ठग गया -
मानव - ममता की बीज बोकर ,
नूतन किसान -
समझ में कुछ ना आया ;
बीज एक भी ना उगला ,
श्रम में कहाँ था कमी -
या भू - धर में अधिक नमी -
हे बीज बोल तो मुझे -
कितनी आश से बोया था तुझे -
क्या मैं ने गलत बीज चुना था ?
भू - धर बाँझ होती है ;
बात ऐ भी सुना था ,
संशय है मुझे -
भ्रष्टाचार से डरकर ;
भू - धर नीचे मर गया तू सड़कर ।
मेरी उर की अभिलाषा -
मानव - ममता की पेड़ उगलेंगे ;
द्रुमों की मृदु छाँय में -
बैठेगा लाचार - भूखा - प्यासा ;
सब लेंगे चैन की साँस ;
पर अंकुर एक भी ना फूटा ,
टूटा जीवन की आश ;
बालपन का सपना टूटा ,
थी इतनी अभिलाषा -
अंकुर उगलेगा ,
पेड़ खिल उठेगा -
खिलेगा - फूलेगा - फलेगा -
मीठा - मीठा फल ;
मेरे अभिलाषा को लिया निगल -
यमराज की काल
डी ,ए, पी - जैविक - जाइम - पोटाश ;
उस में मिलाया -
मेरी उर की आश ;
रे बीज -
तुझे तो बोया अभिलाषा से -
तुम फलों - फूलों ;
जिंक भी डाला ,
क्यों नहीं फूटा अंकुर ?
तुझे झल - कपाट से डर है ;
चारों तरफ फला - फूला भ्रष्टाचार हैं ,
फूट जा रे -
सुन तुझ से एक बात है -
इस युग को तेरी जरुरत है ।
भ्रष्टाचार किस्मत वाला है ;
बिना जतन के -
कितना फला - फूला है ;
बड़ी अभिलाषा से मानव - ममता बोया है ;
तेरे लिए नयन मेरी कितना रोया है ,
तू फूट जा -
तेरे डाली - डाली पे ;
क्रांति वीर खिलेंगे ,
देख लेना -
आमने - सामने खड़ा -
आज शिष्टाचार - भ्रष्टाचार ;
अस्त्र - शस्त्र लेकर -
दोनों पक्षों की वीर खड़े हैं सज - धजकर ;
जैसे नेवला.- नाग ;
रण भूमि तैयार है ,
बज चुकी शंखनाद ,
पक्षों की युद्ध वीर -
तैयार हैं लेकर धनूष तीर ;
कर्म वीर तू भ्रष्टाचार की सीना चीर -
खून से उसकी ! वतन को सींच -
इतिहास की पन्नों मेंं -
खून से लाइन खींच ,
करों क्रांति वीर का आह्वान ;
भ्रष्टाचार से रोता बिलक - बिलक कर वतन ।
रे बीज तू भू में धस गया -
मत समझ तू बच गया ;
फिर मानव - ममता बीज लाऊँगा -
तेरा कँरुगा जतन -
फिर हल जोत के ;
तुझे बोऐगा रतन ,
इस बार उगलाऊँगा ;
वैज्ञानिक पध्दति अपनाऊँगा ;
माटी का पी ,एच मान कराऊँगा ,
मानव - ममता की बीज -
क्यों नहीं उग रहा ?
कमी खोज निकालूँगा ।
अगर तू वर्जन -
तो कर ले यौन - मिलन ;
अंकुर फूट जाऐगा ,
बालपन की सपना साकार हो जाऐगा ,
आज - कल मत कर -
बालपन का सपना है -
कल को काल खा जाऐगा ;
सपना गर्द में मिल जाऐगा ,
अगर अंकुर फूट गया -
समझ ले भ्रष्टाचार -
तेरा नसीब फूट गया ,
खेत खलिहान में होगा -
मानव - ममता की हरियाली ,
सब को दिखलाऊँगा ;
मैं सफल किसान बन जाऊँगा -
इतिहास लिख जाऊँगा ।
भ्रष्टाचार - शिष्टाचार पे भारी है ;
पेड़ की डाली - डाली पे भ्रष्टाचार है ,
सुन भ्रष्टाचार -
पतझड़ भी आता है ;
नव पल्लव खिलता है,
यहीं भू - धर की रीत है ,
क्रांति वीरों की होठों पे -
क्रांति का गीत है।
सुन भ्रष्टाचार तू -
आज फल - फूल रहा है ;
मत कर खुद पे नाज़ ,
तेरे सिर पे अधर्म का ताज़ !
समझ ले -
गर्द में तू मिल जाऐगा ,
कितनी खुशी की बात है -
अंकुर फूटने वाला है -
स्वपन साकार होने की बात है ।
सुन रे भ्रष्टाचार -
कुछ कह रहा है शिष्टाचार ;
धर्म - अधर्म पे सदा विजय पाया है ,
होगा तेरी उल्टी गिनती शुरु -
जब होगा क्रांति का जंग शुरु ,
तुझे गर्द में मिल जाना है ;
क्रांति वीरोंं -
भ्रष्टाचार से देश को आजाद दिलाना है ;
मैं किसान हूँ -
मानव - ममता बीज के अंकुर -
उगलाके सब को दिखाना है ;
स्वपन को साकार करना है ।
सोने वाले जग के देखो -
अभी भी अंगडा़ई है ;
शिष्टाचार - भ्रष्टाचार की लड़ाई है ,
एक - दूजे पे करती चढ़ाई है ;
हर वीरों ने -
मारने - मरने की प्राण प्रतिज्ञा करके आई हैं ,
शिष्टाचार शेर है ;
आह्वान की देर है ,
मनस्थ हो आश ;
शिष्टाचार - भ्रष्टाचार कि -
खूनों से बुझाऐगा प्यास ,
सदा धर्म ने अधर्म पे पताका फराई है ,
नव भारत की नव तिरंगा फहराऐगा ;
पहले उसे खून से नहलाऐगा ;
शिष्टाचार विजय गाथा लिए ख जाऐगा ,
अंकुर फूट जाऐगा ;
खेत रतनों से खिल जिऐगा ।
रतन किर्तनीया
मो * 9343698231