Join Us:
दिशा-लाइव ग्रुप ने लॉन्च किया नया ब्रांड BizPry - लोकल से ग्लोबल तक 20 मई स्पेशल -इंटरनेट पर कविता कहानी और लेख लिखकर पैसे कमाएं - आपके लिए सबसे बढ़िया मौका साहित्य लाइव की वेबसाइट हुई और अधिक बेहतरीन और एडवांस साहित्य लाइव पर किसी भी तकनीकी सहयोग या अन्य समस्याओं के लिए सम्पर्क करें

किसान

Ratan kirtaniya 30 Mar 2023 कविताएँ देश-प्रेम एक किसान मानव - ममता का बीज बोता है अंकुर ना फूटने का मर्मिक चित्रण है अंकुर को क्रांति वीर रुप में वर्णन है 32836 0 Hindi :: हिंदी

अबोध बालपन -
कितना नादान -
बड़ा होकर बनूँ किसान ;
यहीं सोचता रहा -
एकाग्रता से पिता का श्रम देखता रहा -
मेरा नादान बालपन सपना सजाता  रहा -
बालपन की कौतूहल ;
बड़ा होकर -
पिता जी की तरह चलाऊँगा हल ।


बालपन तो खेल - खेल में बीताया ;
ना भूला उसे -
मैं ने जो सपनें सजाया ;
कितना हर्ष - उल्लास की बात है ;
साकार हो सपना -
कर्म - भू करती स्वागत है ,
कितना अंतर्यामिनी कौतूहल ;
बन गया किसान -
चलाऊँगा हल ;
बीज की अंकुर उगलेगा ,
फसल खनकेगा -
मान - सम्मान भी झलकेगा ।

मैं अबोध -
खेत में हल जोतकर ;
मैं ठग गया -
मानव - ममता की बीज बोकर ,
नूतन किसान -
समझ में कुछ ना आया ;
बीज एक भी ना उगला ,
श्रम में कहाँ था कमी -
या भू - धर में अधिक नमी -
हे बीज बोल तो मुझे -
कितनी आश से बोया था तुझे -
क्या मैं ने गलत बीज चुना था ?
भू - धर बाँझ होती है ;
बात ऐ भी सुना था ,
संशय है मुझे -
भ्रष्टाचार से डरकर ;
भू - धर नीचे मर गया तू सड़कर ।


मेरी उर की अभिलाषा -
मानव - ममता की पेड़ उगलेंगे ;
द्रुमों की मृदु छाँय में -
बैठेगा लाचार - भूखा - प्यासा ;
सब लेंगे चैन की साँस ;
पर अंकुर एक भी ना फूटा ,
टूटा जीवन की आश ;
बालपन का सपना टूटा ,
थी इतनी अभिलाषा -
अंकुर उगलेगा ,
पेड़ खिल उठेगा -
खिलेगा - फूलेगा - फलेगा -
मीठा - मीठा फल ;
मेरे अभिलाषा को लिया निगल -
यमराज की काल 

डी ,ए, पी - जैविक - जाइम - पोटाश ;
उस में मिलाया - 
मेरी उर की आश ;
रे बीज -
तुझे तो बोया अभिलाषा से -
तुम फलों - फूलों ;
जिंक भी डाला ,
क्यों नहीं फूटा अंकुर ?
तुझे झल - कपाट से डर है ;
चारों तरफ फला - फूला भ्रष्टाचार हैं ,
फूट जा रे -
सुन तुझ से एक बात है - 
इस युग को तेरी जरुरत है ।


भ्रष्टाचार किस्मत वाला है ;
बिना जतन के -
कितना फला - फूला है ;
बड़ी अभिलाषा से मानव - ममता बोया है ;
तेरे लिए नयन मेरी कितना रोया है ,
तू फूट जा -
तेरे डाली - डाली पे ;
क्रांति वीर खिलेंगे ,
देख लेना -
आमने - सामने खड़ा -
आज शिष्टाचार - भ्रष्टाचार ;
अस्त्र - शस्त्र लेकर -
दोनों पक्षों की वीर खड़े हैं सज - धजकर ;
जैसे नेवला.- नाग ;
रण भूमि तैयार है ,
बज चुकी शंखनाद ,
पक्षों की युद्ध वीर -
तैयार हैं लेकर धनूष तीर ;
कर्म वीर तू भ्रष्टाचार की सीना चीर -
खून से उसकी ! वतन को सींच -
इतिहास की पन्नों मेंं -
खून से लाइन खींच ,
करों क्रांति  वीर का आह्वान ;
भ्रष्टाचार से रोता बिलक - बिलक कर वतन ।


रे बीज तू भू में धस गया -
मत समझ तू बच गया ;
फिर मानव - ममता बीज लाऊँगा -
तेरा कँरुगा जतन - 
फिर हल जोत के ;
तुझे बोऐगा रतन ,
इस बार उगलाऊँगा ;
वैज्ञानिक पध्दति अपनाऊँगा ;
माटी का पी ,एच मान कराऊँगा ,
मानव - ममता की बीज -
क्यों नहीं उग रहा ?
कमी खोज निकालूँगा ।


अगर तू वर्जन -
तो कर ले यौन - मिलन ;
अंकुर फूट जाऐगा ,
बालपन की सपना साकार हो जाऐगा ,
आज - कल मत कर -
बालपन का सपना है -
कल को काल खा जाऐगा ;
सपना गर्द में मिल जाऐगा ,
अगर अंकुर फूट गया -
समझ ले भ्रष्टाचार -
तेरा नसीब फूट गया ,
खेत खलिहान में होगा -
मानव - ममता की हरियाली ,
सब को दिखलाऊँगा ;
मैं सफल किसान बन जाऊँगा -
इतिहास लिख जाऊँगा ।


भ्रष्टाचार - शिष्टाचार पे भारी है ;
पेड़ की डाली - डाली पे भ्रष्टाचार है ,
सुन भ्रष्टाचार -
पतझड़ भी आता है ;
नव पल्लव खिलता है,
यहीं भू - धर की रीत है ,
क्रांति वीरों की होठों पे -
क्रांति का गीत है।


सुन भ्रष्टाचार तू -
आज फल - फूल रहा है ;
मत कर खुद पे नाज़ ,
तेरे सिर पे अधर्म का ताज़ ! 
समझ ले -
गर्द में तू मिल जाऐगा ,
कितनी खुशी की बात है -
अंकुर फूटने वाला है -
स्वपन साकार होने की बात है ।


सुन रे भ्रष्टाचार - 
कुछ कह रहा है शिष्टाचार ;
धर्म - अधर्म पे सदा विजय पाया है ,
होगा तेरी उल्टी गिनती शुरु -
जब होगा क्रांति का जंग शुरु ,
तुझे  गर्द में मिल जाना है ;
क्रांति वीरोंं - 
भ्रष्टाचार से देश को आजाद दिलाना है ;
मैं किसान हूँ -
मानव - ममता बीज के अंकुर -
उगलाके सब को दिखाना है ;
स्वपन को साकार करना है ।


सोने वाले जग के देखो -
अभी भी अंगडा़ई है ;
शिष्टाचार - भ्रष्टाचार की लड़ाई है ,
एक - दूजे पे करती चढ़ाई है ;
हर वीरों ने -
मारने - मरने की प्राण प्रतिज्ञा करके आई हैं ,
शिष्टाचार शेर है ;
आह्वान की देर है ,
मनस्थ हो आश ;
शिष्टाचार - भ्रष्टाचार कि -
खूनों से बुझाऐगा प्यास ,
सदा धर्म ने अधर्म पे पताका फराई है ,
नव भारत की नव तिरंगा फहराऐगा ;
पहले उसे खून से नहलाऐगा ;
शिष्टाचार विजय गाथा लिए ख जाऐगा ,
अंकुर फूट  जाऐगा ;
खेत रतनों से खिल जिऐगा ।

               रतन किर्तनीया
    मो * 9343698231





Comments & Reviews

Post a comment

Login to post a comment!

Related Articles

शक्ति जब मिले इच्छाओं की, जो चाहें सो प्राप्त कर लें। आवश्यकताएं अनन्त को भी, एक हद तक प्राप्त कर लें। शक्ति जब मिले इच्छाओं की, असम्भ� read more >>
शक्ति जब मिले इच्छाओं की, जो चाहें सो हांसिल कर कर लें। आवश्यकताएं अनन्त को भी, एक हद तक प्राप्त कर लें। शक्ति जब मिले इच्छाओं की, आसमा read more >>
इच्छा शक्ति 🥀🥀 शक्ति जब मिले इच्छाओं की, जो चाहें सो हांसिल कर कर लें। आवश्यकताएं अनन्त को भी, एक हद तक प्राप्त कर लें। शक्ति जब मिल� read more >>
Join Us: