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ऐ जीवन के थके मुसाफिर

Adesh Kumar 22 Jan 2025 कविताएँ समाजिक कविता हिन्दी में kavita in hindi 18807 0 Hindi :: हिंदी

ऐ जीवन के थके मुसाफिर,
                          बढ़ चल मंजिल अब दूर नहीं ।
कर्म करे फल ना पाये,
                          ये प्रकृति का दस्तूर नहीं ॥ 
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माना कि राह में कांटे हैं,
                      कांटों पे चल कर दर्द  मिला !
कांटो के बीच में रहकर ही,
                      मनमोहक तरु पर फूल खिला !!
परिश्रम से कोई भी सपना,
                      होता कभी चकनाचूर नहीं !
ऐ जीवन के थके मुसाफिर,                                        
                              बढ़ चल मंजिल अब दूर नहीं !!
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जब पड़ी हथौड़ों की चोटें ,
                                तब पड़ा था सहना दर्द घना !
कभी था जो मुसाफ़िर की ठोकर ,
                               वो पत्थर भी भगवान बना !!
तू ना बन पाये इस काबिल ,
                             तू इतना भी नासूर नहीं !
ऐ जीवन के थके मुसाफ़िर 
                              बढ़ चल मंजिल अब दूर नहीं !!
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चलते चलते जो बैठ गया ,
                             तो वक्त और बढ़ जायेगा !
जो सुबह खिली किरणों वाली ,
                                वो दिन ऊपर चढ़ जायेगा !!
बिना चले मिल जाये मंजिल ,
                                उस रब का तू कोई नूर नहीं !
ऐ जीवन के थके मुसाफ़िर ,
                                बढ़ चल मंजिल अब दूर नहीं ।
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ऐ जीवन के थके मुसाफिर,
                          बढ़ चल मंजिल अब दूर नहीं ।
कर्म करे फल ना पाये,
                          ये प्रकृति का दस्तूर नहीं ॥ 
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