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आईना-ए-जिंदगी

Komal Kumari 04 Feb 2025 कविताएँ समाजिक 23834 0 Hindi :: हिंदी

आईना-ए-जिंदगी में खुद का अक्स देखते रहे  
ढूंढते रहे खुद को खुद में और यूं ही खोते रहे 
कभी खुद को अमीर पाया तो कभी गरीब बनते देखा है 
होकर सबकी असलियत से रूबरू 
खुद को अनजान समझती है 
 आईना -ए -जिंदगी ।
आईना अक्सो का मेला है 
इस मेले में झूठ के दीवारें हैं 
इन दीवारों में दिखावटी की सजावटी है 
जानकर भी खुद को अनजान समझती है
आईना- ए -जिंदगी।
होती है खड़ी बाजारों में 
बिकती है दामों में 
लोग देखते हैं चेहरे दर्पण में 
यह दर्पण ही लोगों का साथी बन जाता है 
साथी बन आईना ने बताया हमारी तस्वीर क्या है 
इंसान वही जो ठोकर खाकर संभल ले खुद को 
आईना बखूबी जानता है असलियत क्या है चेहरे की 
 छुपा का चेहरे चाहे जितना भी खुद से दर्पण इस मुखड़े के सारे राज जानता है 
शुक्र गुजार हूं आइने बनाने वाला का जिसने भरम को तोड़ा है, खुद को खुदा मानने वालों का ।

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