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अतिशोक क्यों ?

Saurabh Sonkar 21 Oct 2025 कविताएँ दुःखद इस दुनिया का दस्तूर है ये कुछ फूल नहीं मुरझाएंगे कुछ फूल न तोड़े जाएंगे नए फूल फिर खिलेंगे कैसे... इस दुनिया का दस्तूर है ये कुछ दीप नहीं जल पाएंगे कुछ दीप नहीं बुझ जाएंगे नए दीप फिर जलेंगे कैसे... इस दुनिया का दस्तूर है ये कुछ पेड़ नहीं जग पाएंगे कुछ पेड़ नहीं कट जाएंगे नए पेड़ फिर उगेंगे कैसे... इस दुनिया का दस्तूर है ये कुछ फसल नहीं जग पाएंगी कुछ फसल नहीं कट जाएंगी नई फसल फिर लगेंगी कैसे... इस दुनिया का दस्तूर है ये कुछ वंश नहीं बढ़ पाएंगे कुछ वंश नहीं मिट जाएंगे नए वंश फिर बनेंगे कैसे... इस दुनिया का दस्तूर है ये कुछ नियम नहीं लांघे जाएंगे कुछ नियम नहीं तोड़े जाएंगे नए नियम फिर बनेंगे कैसे... इस दुनिया का दस्तूर है ये कुछ राह नहीं भरमा पाएंगे कुछ राह नहीं भटक जाएंगे नए रही फिर बनेंगे कैसे... इस दुनिया का दस्तूर है ये कुछ कार्य नहीं पूरे हो पाएंगे कुछ कार्य न अधूरे रह जाएंगे नए कार्य शुरू फिर होंगे कैसे... इस दुनिया का दस्तूर है ये कुछ दिल नहीं लुभाएंगे कुछ दिल न दुखा जाएंगे नई पसंद फिर बनेंगी कैसे... इस दुनिया का दस्तूर है ये कुछ दुःख नहीं कट पाएंगे कुछ दुःख नहीं रह जाएंगे नई बंदिशे फिर बनेंगी कैसे.. रचना - अतिशोक क्यों ? कवि/लेखक - सौरभ सोनकर #अतिशोक_क्यों? #SaurabhSonkar #अतिशोकक्यों? #अतिशोक_क्यों? 14720 0 Hindi :: हिंदी

अतिशोक क्यों ?

इस दुनिया का दस्तूर है ये
कुछ फूल नहीं मुरझाएंगे
कुछ फूल न तोड़े जाएंगे
नए फूल फिर खिलेंगे कैसे...

इस दुनिया का दस्तूर है ये
कुछ दीप नहीं जल पाएंगे
कुछ दीप नहीं बुझ जाएंगे
नए दीप फिर जलेंगे कैसे...

इस दुनिया का दस्तूर है ये
कुछ पेड़ नहीं जग पाएंगे
कुछ पेड़ नहीं कट जाएंगे
नए पेड़ फिर उगेंगे कैसे...

इस दुनिया का दस्तूर है ये
कुछ फसल नहीं जग पाएंगी
कुछ फसल नहीं कट जाएंगी
नई फसल फिर लगेंगी कैसे...

इस दुनिया का दस्तूर है ये
कुछ वंश नहीं बढ़ पाएंगे
कुछ वंश नहीं मिट जाएंगे
नए वंश फिर बनेंगे कैसे...

इस दुनिया का दस्तूर है ये
कुछ नियम नहीं लांघे जाएंगे
कुछ नियम नहीं तोड़े जाएंगे
नए नियम फिर बनेंगे कैसे...

इस दुनिया का दस्तूर है ये
कुछ राह नहीं भरमा पाएंगे
कुछ राह नहीं भटक जाएंगे
नए रही फिर बनेंगे कैसे...

इस दुनिया का दस्तूर है ये
कुछ कार्य नहीं पूरे हो पाएंगे
कुछ कार्य न अधूरे रह जाएंगे
नए कार्य शुरू फिर होंगे कैसे...

इस दुनिया का दस्तूर है ये
कुछ दिल नहीं लुभाएंगे
कुछ दिल न दुखा जाएंगे
नई पसंद फिर बनेंगी कैसे...

इस दुनिया का दस्तूर है ये
कुछ दुःख नहीं कट पाएंगे
कुछ दुःख नहीं रह जाएंगे
नई बंदिशे फिर बनेंगी कैसे..

कवि/लेखक - सौरभ सोनकर

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