राजेश भण्डारी 20 Dec 2025 कविताएँ समाजिक 7761 0 Hindi :: हिंदी
जब आया तू इस दुनियां मे
ना अपना था ना गैर कोई।
बंधकर फिर इस मोह माया मे
तब चेतना कभी फिर सोई नहीं ।
तिनका -तिनका फिर बना घोंसला
पर अंत समय पछताएगा ।
आकर कोई तुफान कहीं से
घर उड़ा ले जायेगा।
तेरी आशा तेरी तृष्णा
छूट ना पाए जीवन तक।
माया रूपी बेल है जग में
जो शुख ना पाए अन्तो तक।
छण-भंगूर की इस दौलत पर
क्यूं इतना इतराता है।
मूठ भी तेरी बंद ना होगी
जब जायेगा कंधों पर।
मेरा -मेरी । तेरा-तेरी
तब तक तू सब करता है।
कीमत मिलती सूत-सूत की
विदा यहां से जब होता है।
फिर खेल देखना आसमान से
अपने कर्म के मेलों का।
हकदार होगा कितना फिर तू
बस ढाई हाथ के कपड़ों का।
पश्चाताप फिर होगा मन में
अपने कर्म नतीजों का।
यहां था जब तक समझ ना पाया
कीमत अनमोल उस मोती का।
होती हासिल ज्ञान किरण इक
मिलता राह किनारे का।
राम-नाम की टेक को लेकर
हो जाता अन्त अंधेर का।
लेखक- कवि राज
राजेश भण्डारी