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बूढीया री जूती

Radheshyam Joshi 02 Feb 2026 कविताएँ समाजिक 8406 0 Hindi :: हिंदी

चालता जद चरड़ चरड़ करती,
जाणै बां'रै हाडा स्यूं होड़ करै।
टाबरिया नैं बूंटिया दिरा'र खुद,
चापू लगवा लेता बोदी खाल रौ।
पण हिम्मत री कमी कोनी ही,
कवंता आपां'रै मौज है मौज।।
- राधेश्याम जोशी कोहिणा

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