Chanchal chauhan 02 Jul 2023 कविताएँ समाजिक 21706 0 Hindi :: हिंदी
बेटी की जिंदगी, एक उलझन हैं, ना ससुराल हैं उसका, ना मायका, दोनों तरफ से पराई हैं, मन को मार के हैं जीती, कैसी रीत पुरानी है, समझते उसे बोझ, दाना पानी का ताना भारी हैं, खाती हैं कमाई हमारी, कहां से लाती हैं, बेवस हो जाती हैं नारी, नारी सताई जाती हैं, मां बाप से हैं विनती मेरी, पढ़ाओ बेटी को इतना, अपने पैरों पर खड़ी हो जाये, अपना खर्चा खुद उठा सकें, दुनिया के आगे हाथ ना फैलाये।
Mera sapna tha apne bicharo ko logo tak phunchana unko jiwn ki sikh ,prerna dena unmai insaniyat jag...