Rakshi 15 Feb 2025 कविताएँ समाजिक 13813 0 Hindi :: हिंदी
इन जंजीरों को तोड़कर रुख हवा का मोड़कर चल रहे हैं देखो हम गर्दिशों को छोड़कर कारवां को मोड़कर चल रहे हैं देखो हम पंख हवा में खोलकर बेड़ियों को तोड़कर चल रहे हैं देखो हम खामोशियों को तोड़कर बुलंदियों का शोर कर चल रहे है देखो हम रुखसार परवीन