शरद भूषण मोंगरा 27 Apr 2026 कविताएँ समाजिक छप्पर वाले यार पुराने आंगन में, ग्रामीण क्षेत्र 7977 0 Hindi :: हिंदी
छप्पर वाले.... छप्पर वाले यार पुराने आंगन में औस टपकती रात सिराहने आंगन में चादर में ढकता हूं तन जैसे तैसे कैसे सोऊं रात बिताने आंगन में छप्पर वाले यार पुराने आंगन में डिबिया जलती रात भगाने आंगन में बूंद टपकती रोज जगाने आंगन में भीगी चादर ओढ़ू तो कैसे ओढूं रात सताती रोज पुराने आंगन में छप्पर वाले यार पुराने आंगन में दिन भर करती काम कांपती सर्दी में आंख टपकती रोज सुहाने आंगन में खुद की तो सहता हूं मैं जैसे तैसे मां भी सोती यार पुराने आंगन में छप्पर वाले यार पुराने ने आंगन में। शरद भूषण मोंगरा