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ढलती शाम

Uday singh kushwah 30 Mar 2023 कविताएँ प्यार-महोब्बत Google/yahoo/bing 129531 0 Hindi :: हिंदी

ढलती शाम...शीर्षक

कौतुहल से दूर ढलती संध्या ,
समेटती प्रकृती अपने करतलों को...!
घर जातीं गाय धूल उडा़ती ,
बछडो़ को पाने सुख रभांती ..!

आसमान में उड़ते पंक्षी चुगने को पीछे छोड़
नीड में लौटने को आतुर गाते गीत मधुर ...!
सूने वृक्ष पर ढलती संध्या गाती गीत विरह के,
कल फिर मिलने की कहकर करती प्रस्थान...!

पश्चिम में ढलता सूरज करता अंखजोरी,
कहता मिललो अभी सुबह बात कुछ होगी!
घांस फूस र्पवत शिखर अंधिकार में अब डूब रहे ,
निशा नवेली करती छलवेली आकर इठलाती...!

हर घर में दीप जलाओ हम से यह कहजाती,
रूप सजाकर अपनी लवेली दुनियां सजाती...!
चमकादड़ उल्लूओ की नयी दुनिया नव निशा
गीत गाती प्रकृति इन्हे देख हृदय से मुस्कराती...!

शनै शनै शशि की भोर आती साथ लिपटी चांदनी
पेड,पौधे,र्पवतों के क्षितिज पर अपना रंग दिखलाती!
बिखरे पडे़ तारों की जमात लग आती टिम टिम करते
संदकुची से रोशनी विछाती क्षितिज को खूब सजातीं!

कवि यू.एस.बरी
लश्कर,, ग्वालियर, मध्यप्रदेश

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