Anilkumar Rathwa (Sameer) 04 Dec 2025 कविताएँ समाजिक “इरादों के पहाड़” 14403 0 Hindi :: हिंदी
धूल चाहे जितनी भी ऊँची उड़ ले, कोई आसमान को गंदा नहीं कर पाती; इंसान भी हालातों से कितना ही टूटे, सच्ची नीयत उसको फिर से खड़ा बनाती। ज़िंदगी हर मोड़ पर परीक्षा लेती है, कहीं आँधी, कहीं तूफ़ान, कहीं कड़क धूप; पर जो कदम डगमगाने नहीं देता, वही बनता है अपना भविष्य, अपना रूप। अँधेरों में भी रोशनी ढूँढनी पड़ती है, टूटे सपनों में भी उम्मीद बोनी पड़ती है; जिंदगी कभी आसानी से रास्ते नहीं देती, मंज़िल पाने के लिए ठोकरें भी सहनी पड़ती हैं। हार का डर तो हर किसी में होता है, पर जीत उन्हीं की होती है जो डर को जीतते हैं; कर्म ठोस हों, इरादे आग जैसे हों, तो पहाड़ भी रास्ता छोड़ खड़े दिखते हैं। सपनों का बोझ हल्का नहीं होता, पर उम्मीदें कंधों को मजबूत बना देती हैं; आज के संघर्ष भले थका दें तुम्हें, पर कल की जीतें इन्हीं से चमकती हैं। धूल की कहानी बस हवा के भरोसे चलती है, मगर कर्म का इतिहास मेहनत लिखती है; ऊँचाई पर जाना कोई बड़ी बात नहीं, ऊँचाई पर टिके रहना ही असली इज़्ज़त होती है। इसलिए रुकना मत, झुकना मत, तूफ़ानों के आगे थमना मत; जो अपने सपनों के लिए जलते हैं, किस्मत के आसमान पर उनका नाम कभी धुंधला नहीं पड़ता।