PRIYA TIWARI 11 Jan 2026 कविताएँ दुःखद 6373 0 Hindi :: हिंदी
एक फूल मिला,
जो कुछ मुझसे कुछ दूर मिला।
जिसमें लगा कुछ धूल दिखा ,
जो मुझसे रूठा बैठा मिला।
मिला रूठा मुझे एक डगर में,
अकेला बैठा सुन सन शहर में।
उसके आंखों में कुछ आश जगी,
मुझसे मिलने की लगन लगी ।
उसकी जुल्मी आंखों में,
कुछ कहने की अरमान जगी ।
वह रोता, बिलखता , सिसक रहा ,
अपने सपनों को संजो रहा ।
कहूं या न कहूं कि दुविधा की
आत्म कथा में जूझ रहा ।
कभी आश से इतराता,
कभी गुस्से में उतरता,
खुद को समझना मुश्किल था ,
इसलिए,
शायद ओ दूर खड़ा ।
मैं समझ सकी न उसकी गाथा,
क्या सपनों को संजोया था ,
किसी आत्म कथा की नैया सी।
गंभीर पड़ा,कही दूर खडा ।
मैं उसकी सहायता कैसे करूं,
उसकी भाषा कैसे समझू ,
उसकी आंखों में द्वन्द्व दिखा ,
मैं सामने थी , निशब्द खडा ।
मैं क्या बोलू ,
क्या समझाऊं ,
मैं सोच रही थी मन ही मन ,
लेकिन उसको देख देख ,
पुलकित होता मेरा तन मन।
उसकी पुलकित काया मुझसे ,
कुछ कहने की तो चाह रहा ,
पर वह दुखों की उलझन में ,
मुझसे नजरें चुरा रहा ।
वह समझ रहा मै न समझू ,
यह तो उसकी नीति है ,
मैं निशब्द खड़ी उस दुखिया से ,
कैसे पूछू उसकी क्या आपबीती है ।
कैसे कहूं उस से ,
शायद , ये ही प्रकृति की नीति है ।
शायद इसीलिए .....
वो चूर पड़ा है ,
अपने आप से दूर खड़ा है ।
(लेखिका - प्रिया तिवारी)