Mamta pannu 21 Dec 2025 कविताएँ अन्य एक जमींदार की ढाणी, एक किसान की ढाणी, जमींदार,मेरे बापू, म्हारी ढाणी, 17142 0 Hindi :: हिंदी
दो ज़िलों की कटती सीमा पर
जुड़ते दो गांव संग सड़क सड़क।
दो बसें चलती यहाँ रोज़
खिड़की संग खड़क खड़क।
इसी खड़क से थोड़ा दूर ,
है एक... जमींदार की ढाणी ।
मेरे बापू , म्हारी ढाणी ।
खेत में कुआं हरी भरी छांव
दिन रात मेहनत और भीगे पांव
बापू मेरे रखते सिर पर साफा,मूंछों पर ताव
धान ,सरसों की हरी भरी खेती
लहसून की क्यारियाँ और धनिया मैथी
हरी फली सोगरी, फूल पत्ता गोभी
काला कुत्ता टॉमी काटे
अनजान ,पूछे बिन ले जाए जो भी ।
बैंगन के पौधे, मटर की लड़ियां
ऐसा आवरण शांत दूर तलक ना बैर,
ना पड़ोसी से झगड़िया ।
ऐसी हरियाली संग खुशहाली कहाँ?
माँ बापू का पसीना मोती बनकर उगता जहाँ
मैं बेटी और दो बेटों संग सुंदर बहुएँ यहाँ
ये हकीकत है , न कोई कहानी
है एक जमींदार की ढाणी
मेरे बापू , म्हारी ढाणी ।
ममता पन्नू