Anilkumar Rathwa (Sameer) 15 Sep 2025 कविताएँ अन्य ईश्वर और इंसान का संवाद 25140 0 Hindi :: हिंदी
पता नहीं कैसे परखता है मुझे मेरा ईश्वर, परीक्षा भी कठिन लेता है और हारने भी नहीं देता। मैं अक्सर कहता हूँ— "हे प्रभु! इतना बोझ क्यों दिया मुझे? हर कदम काँटों से क्यों भरा तूने?" और वो मुस्कुराकर कहता है— "अगर राह आसान कर दूँ तो तेरा हौसला कहाँ दिखेगा? अगर आँसू न बहें तो तेरे दिल की गहराई कहाँ निकलेगी?" मैं रोकर कहता हूँ— "कभी-कभी लगता है मैं टूट जाऊँगा, तेरी दी हुई कठिनाइयों में बिखर जाऊँगा।" वो शांत स्वर में कहता है— "टूटना ही तो ज़रूरी है, ताकि तेरे भीतर का नया रूप जन्म ले सके। सोने को तपना पड़ता है आग में, तभी तो उसका असली नूर निकलता है।" मैं शिकायत करता हूँ— "लोग हँसते हैं मुझ पर, कहते हैं मेरा संघर्ष व्यर्थ है। क्यों अकेला कर दिया तूने मुझे?" वो जवाब देता है— "तन्हाई में ही आत्मा अपनी आवाज़ सुनती है। भीड़ में रहकर इंसान दूसरों को देखता है, पर अकेले रहकर वही खुद को पहचानता है।" मैं धीरे से पूछता हूँ— "तो क्या ये सारी पीड़ा तेरी कृपा है?" वो हँसकर कहता है— "हाँ, हर आँसू एक दुआ है, हर घाव एक सीख है। परीक्षा कठिन ज़रूर है, पर हार तेरे नसीब में लिखी ही नहीं। क्योंकि मैं तुझे हार मानने ही नहीं दूँगा।" और उस क्षण मुझे समझ आता है— ईश्वर दूर नहीं, मेरे हर साँस में, हर धड़कन में छुपा है। वो मुझे परखकर गिराता नहीं, बल्कि सँवारकर उठाता है।