SANDIP KUMAR SINGH 16 Jun 2023 कविताएँ समाजिक दास्तान,की,यहां,मैं,को 25966 0 Hindi :: हिंदी
अपने जज्बातों को मैं यहां अंकित कर रहा हूं, मोती जैसे अल्फाजों से दास्तान लिख रहा हूं। जिन्दगी सु:ख_दुःख का एक अद्भुत संगम है, इसे हर हाल में खुशियों के रंग से रंग रहा हूं। पग_पग पर इम्तिहान की लौ से गुजरना है, फिर भी मुस्कुराते हुए सबसे रूबरू हो रहा हूं। एतिबार कर के भी छलने वाले मिल जाते हैं, तब से दिल को धैर्य का सहारा दे रहा हूं। कभी अपनों से तो कभी परायों से अनबन है, ऐसे हालात में लहू जिगर का पी रहा हूं। सोचता हूं जज़्बात सारे सकार हो ही जाए, परन्तु घात_प्रतिघात का शिकार हो रहा हूं। प्रार्थना भी बेकार साबित हो जाते हैं, कोशिश का दामन थामे बढते जा रहा हूं। मायूसी का आगमन जोर_शोर से होता है, कुछ शुद्ध आत्माओं के सहारे जी रहा हूं। बहुरंगी जीवन के खेल में तमन्नायें जवां है, हौसला को रोज तूफ़ानी हवा दे रहा हू। संदीप कुमार सिंह✍🏼 जिला:_समस्तीपुर(देवड़ा)बिहार