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जख्मों का सिलसिला

संदीप कुमार सिंह 02 Jun 2026 कविताएँ समाजिक सामाजिक कुरीतियों के कारण हम बुद्धि जीवी लोगों को कुछ कष्ट उठाना पड़ता है. मेरी इस कविता को पढ़कर आप इन कष्टों से मुक्त हो पायेंगे. आप का हार्दिक स्वागत है. 506 0 Hindi :: हिंदी

जख्मों का सिलसिला
कुछ इस कदर जख्मों का सिलसिला शुरू हुआ है,
एक के बाद एक नए रूप में दस्तक दे रहा है।
सारे सपने रेत की महल की तरह बिखर गए,
दिल में एक आह सी कसक उठती है।

रोम_रोम इस जख्मों से प्रभावित हुआ है,
एक_एक लफ्ज़ इस जख्मों के साए में है।
पर मेरे हौसलों में कोई कमी नहीं है,
हौसला तो पूर्ववत ही अपने ज़िद  में है।

कुछ दिनों बाद खुशियों की हवा चली,
सारे जख्म इस हवा के प्रभाव से भर गए।
जज़्बात सारे फिर से नए हुए,
और मेरे बुलंदियों की चाहत खिल उठी।
(स्वरचित मौलिक)
संदीप कुमार सिंह*Author*

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