Anilkumar Rathwa (Sameer) 22 Feb 2026 कविताएँ समाजिक "ज्ञान बिन अधूरा सफ़र" 5669 0 Hindi :: हिंदी
जो शिक्षा की देहली को लाँघ नहीं पाता है, वह जीवन भर खुद को पीछे ही पाता है। मंज़िलें तो सामने होती हैं सबके मगर, बिन ज्ञान के वह डगमगाता चला जाता है। कहने को तो पाँव हैं, पर गति में वो बात कहाँ, सत्य और तर्क की वो बुलंद आवाज़ कहाँ। दुनिया तो दौड़ती है विचारों के पंख लगाकर, पर बिना शिक्षा के जीवन में वो परवाज़ कहाँ। "लंगड़ा कर चलेगा वह अंत तक"—यह बात अटल है, क्योंकि अज्ञानता ही जीवन का सबसे बड़ा दलदल है। न वह समाज को समझता, न खुद को जान पाता है, बस दूसरों की बैसाखियों पर अपना वजूद टिकाता है। वक़्त की इस आंधी में वही टिक पाएगा, जो हुनर और शिक्षा के दीप जलाएगा। वरना हर मोड़ पर ठोकर ही नसीब होगी, और अंत समय तक बस पछतावा हाथ आएगा।