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ज़हर से सच तक

Abhishek Mishra 28 Oct 2025 कविताएँ समाजिक ज़हर से सच तक, Jahar Se Sach Tak, Kavi Abhishek Mishra, Ballia Vale Kavi, Abhishek Ki Kavita 7958 0 Hindi :: हिंदी

कभी संग बैठते थे चौपाल पे सब यार,
हँसी बाँटते थे मिल-जुलकर बार-बार।
राम की कथा सुनते थे सब यहाँ,
औली में गूँजता था अल्लाह जहाँ।

आज क्यों दीवारें बन रही हैं नई,
जहाँ मोहब्बत थी, वहाँ नफ़रत भरी।
सोशल का धुँआ है फैलता ज़हर,
सच को दबाकर बेचता है ख़बर।

सनातन का अर्थ है – सबको अपनाना,
ना कि किसी और को छोटा बताना।
क़ुरान का संदेश भी अमन सिखाए,
नफ़रत की आग में क्यों दिल जलाएँ?

मंदिर में जलाते हो अगर दीपक तुम,
तो मस्जिद की रोशनी भी है उतनी ही गुम।
गुरुद्वारे की सेवा, गिरजाघर का प्यार,
सबमें बसा है वही परवरदिगार।

बचपन में साथ खेले थे हम सब,
कभी हिन्दू, कभी मुस्लिम, सब थे रब।
जिस हाथ में कलम और किताबें थीं यार,
उसी हाथ में भर दी गई हैं तलवार।

यह राजनीति का खेल है पुराना,
बाँट कर कमाना है इनका बहाना।
पर सच में तो न कोई बड़ा, न कोई छोटा,
इंसान है सबसे पहला और सबसे सच्चा।

ना समझो सनातन को नफ़रत का नाम,
ना समझो इस्लाम को हिंसा का काम।
हर धर्म कहे है यही बार-बार,
"इंसान बनो, बस मोहब्बत करो यार।"

तोड़ो ये दीवारें जो मन में उठीं,
जलाओ वो लौ जो कभी दिल में जली।
ये देश है सबका, ये धरती महान,
मानवता से ही रहेगा इसका सम्मान।

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