Akshay kumar Meena 05 Nov 2023 कविताएँ राजनितिक कमबख्त यह दर्द सत्ता का जोर है कि हटता ही नहीं, दर्द है महंगाई का दोर है कटता ही नहीं।। अब तो बात अंत पर आ गई है, दर्द ए महंगाई मेरे सीने पर काल की तरह छा गई है।। उखाड़ फेंकेंगे उसे दर्द को , जो भूल रहा है अपने फर्ज को।। नफरत के बाजार में मोहब्बत की दुकान ना चली। चला गया पूरा पैसा उनकी जेब में , घर पहुंचने को शामं ना बची।। शहर यह नया रहना सीख लेंगे । दर्द है नया सहना सीख लेंगे।। उगलते जहर है देखा उनको । जलते शहर देखकर परवाह नहीं जिनको।। गांव से नया आया हूं शहर में । यहां आकर पता चला जहर होता है इंसानों में, नहीं सांपों के जहन में।। न जाने लटक गए फंदे पर कितने किसान । पता नहीं सत्ता में बैठे भी है या नहीं इंसान।। 43216 1 5 Hindi :: हिंदी
कमबख्त यह दर्द सत्ता का जोर है कि हटता ही नहीं, दर्द है महंगाई का दोर है कटता ही नहीं।। अब तो बात अंत पर आ गई है, दर्द ए महंगाई मेरे सीने पर काल की तरह छा गई है।। उखाड़ फेंकेंगे उसे दर्द को , जो भूल रहा है अपने फर्ज को।। नफरत के बाजार में मोहब्बत की दुकान ना चली। चला गया पूरा पैसा उनकी जेब में , घर पहुंचने को शामं ना बची।। शहर यह नया रहना सीख लेंगे । दर्द है नया सहना सीख लेंगे।। उगलते जहर है देखा उनको । जलते शहर देखकर परवाह नहीं जिनको।। गांव से नया आया हूं शहर में । यहां आकर पता चला जहर होता है इंसानों में, नहीं सांपों के जहन में।। न जाने लटक गए फंदे पर कितने किसान । पता नहीं सत्ता में बैठे भी है या नहीं इंसान।।
2 years ago
I am a student and studying in University of Rajasthan College, Jaipur...