प्रवीण कुमार 09 Oct 2025 कविताएँ समाजिक 6655 0 Hindi :: हिंदी
क्यों ख़्वाब से परेशान है? ज़िन्दगी! मासूम हक़ीक़त ने भी इसके दामन को चिर (काट-फाड) दिया। बहाने के दरमियान ये जो अपनों को खोजती। ज़िन्दगी! जिस बेटी से मर्यादा सजाई आंखों से उम्मीदों में सच वह मातृत्व के रस-शैली में आगे चली। पिता पर भी निर्भर निरंतर, सच की राह चली। आज एक है उसकी खुशी! मासूम ही सही अपने को पहचान सकी।